अमरबेल के फायदे

औषधीय गुणों से भरपूर अमरबेल
आपने भी अमरबेल को किसी न किसी बड़े पेड़ पर फैले हुए जरूर देखा होगा। हालांकि लोग इसे खरपतवार समझकर निकाल फेंकते हैं, लेकिन बहुत कम लोग ही इसके औषध्ाीय गुणों से वाकिफ होंगे। अमरबेल फालतू नहीं बड़े काम की होती है। आइए, हम आज आपको इसके औषध्ाीय गुणों से परिचित कराते हैं-
अमरबेल का परिचय:-
अमरबेल एक पराश्रयी (दूसरों पर निर्भर) लता है, जिसे प्रकृति का चमत्कार ही कहा जा सकता है। बिना जड़ की यह बेल जिस वृक्ष पर फैलती है, अपना आहार उसके रस चूसने वाले सूत्र के माध्यम से प्राप्त कर लेती है। अमरबेल का रंग पीला और पत्ते बहुत ही बारीक तथा नहीं के बराबर होते हैं। अमरबेल पर सर्द ऋतु में कर्णफूल की तरह गुच्छों में सफेद फूल लगते हैं। इसके बीज राई के समान हल्के पीले रंग के होते हैं। अमरबेल बसंत ऋतु (जनवरी-फरवरी) और ग्रीष्म ऋतु (मई-जून) में बहुत बढ़ती है और शीतकाल में सूख जाती है। जिस पेड़ का यह सहारा लेती है, उसे सुखाने में भी यह कोई कसर बाकी नहीं छोड़ती।
अमरबेल गर्म एवं रुखी प्रकृति की होती है। इस लता के सभी भागों का उपयोग औषध्ाि के रूप में किया जाता है।
अमरबेल का प्रयोग खुजली दूर करने, त्वचा के बाहरी प्रयोग, आंखों के रोगों को नाश करने तथा पित्त, कफ और आमवात के नाश करने के लिए किया जाता है। इसे वीर्य बढ़ाने वाले रसायन और बलकारक के रूप में जाना जाता है।
अमरबेल को पीसकर बनाए गए लेप को शरीर के खुजली वाले अंगों पर लगाने से आराम मिलता है। अमरबेल और मुनक्के को समान मात्रा में लेकर पानी में उबालकर बनाए गए काढ़े को छानकर 3 चम्मच रोजाना सोते समय पीने से पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं।
गंजेपन को दूर करने के लिए गंज वाले स्थान पर अमरबेल को पानी में घिसकर तैयार किया लेप नियमित रूप से दिन में दो बार चार से पांच हफ्ते तक लगाने से लाभ मिलता है।
लगभग 50 ग्राम अमरबेल को कूटकर एक लीटर पानी में पकाकर बालों को ध्ाोने से बाल सुनहरे व चमकदार बनते हैं, बालों का झड़ना और रूसी में भी इससे लाभ होता है। इसका लेप सिर में लगाने से जुएं भी मर जाती हैं।
अमरबेल के बीजों को पानी में पीसकर बनाए गए लेप को पेट पर लगाकर कपड़े से बांध्ाने से गैस की तकलीफ, डकारें आना, अपान वायु (गैस) न निकलना, पेट दर्द एवं मरोड़ जैसे कष्ट दूर हो जाते हैं।
अमरबेल का बफारा (भाप) देने से गठिया वात की
पीड़ा और सूजन शीघ्र ही दूर हो जाती है। बफारा देने के पश्चात इस पानी से स्नान कर लें तथा मोटे कपड़े से शरीर को खूब पोंछ लें।
अमरबेल के बफारे से अंडकोश की सूजन भी हट जाती है।
ऐसी प्राचीन मान्यता है कि अमरबेल को सूती ध्ाागों में बांध्ाकर बच्चों के कंठ (गले) व भुजा (बाजू) में बांध्ाने से कई बाल रोग दूर होते हैं।
अमरबेल पीले ध्ाागे की तरह से भिन्ना व हरे रंग की भी पाई जाती है, जिसे पीसकर मक्खन तथा सोंठ के साथ मिलाकर लगाने से चोट के घाव भी जल्दी ठीक हो जाते हैं।
अमरबेल से जुडे आदिवासी हर्बल नुस्खे
जंगलों, सड़क, खेत खलिहानों के किनारे लगे वृक्षों पर परजीवी अमरबेल का जाल अक्सर देखा जा सकता है, वास्तव में जिस पेड़ पर यह लग जाती है, वह पेड़ धीरे धीरे सूखने लगता है। इसकी पत्तियों मे पर्णहरिम का अभाव होता है जिस वजह से यह पीले रंग की दिखाई देती है। इसके अनेक औषधीय गुण भी है। अमरबेल का वानस्पतिक नाम कस्कूटा रिफ़्लेक्सा है। आदिवासी अंचलों में अमरबेल को अनेक हर्बल नुस्खों के तौर पर उपयोग में लाया जाता है, चलिए जानते हैं आज अमरबेल से जुडे हर्बल नुस्खों और आदिवासी जानकारियों को..
पूरे पौधे का काढ़ा घाव धोने के लिए बेहतर है और यह टिंक्चर की तरह काम करता है। आदिवासियों के अनुसार यह काढा घावों पर लगाया जाए तो यह घाव को पकने नहीं देता है।
बरसात में पैर के उंगलियों के बीच सूक्ष्मजीवी संक्रमण या घाव होने पर अमरबेल पौधे का रस दिन में 5-6 बार लगाया जाए तो आराम मिल जाता है।
अमरबेल को कुचलकर इसमें शहद और घी मिलाकर पुराने घावों पर लगाया जाए तो घाव जल्दी भरने लगता है। यह मिश्रण एंटीसेप्टिक की तरह कार्य करता है।
गुजरात के आदिवासी हर्बल जानकार इसके बीजों और पूरे पौधे को कुचलकर आर्थराईटिस के रोगी को दर्द वाले हिस्सों पर पट्टी लगाकर बाँध देते है। इनके अनुसार यह दर्द निवारक की तरह कार्य करता है।
गंजेपन को दूर करने के लिए पातालकोट के आदिवासी मानते हैं कि यदि आम के पेड़ पर लगी अमरबेल को पानी में उबाल लिया जाए और उस पानी से स्नान किया जाए तो बाल पुन: उगने लगते है।
डाँग के आदिवासी अमरबेल को कूटकर उसे तिल के तेल में 20 मिनट तक उबालते हैं और इस तेल को कम बाल या गंजे सर पर लगाने की सलाह देते है। आदिवासी हर्बल जानकारों के अनुसार यह तेल बालों के झडने का सिलसिला कम करता है और गंजे सिर पर भी बाल लाने में मदद करता है

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