क्या कुरान के एक हिस्से को बकरी ने खा लिया था।

अक्सर एक सवाल मे मुस्लिमों को उलझाया जाता है कि अल्लाह ने कुरआन में कुरान की हिफाजत की जिम्मेवारी ली है (15:9). लेकिन हजरत आएशा एक हदीस मे बयान करती हैं कि जब नबी करीम स. का देहावसान हुआ तो हम सब उनके कफन-दफन की अफरा तफरी में थे. उस दौरान एक बकरी कुरआन की रजम और दुग्धजातता सम्बन्धी आयते, जो मेरे बिस्तर के नीचे रखी हुई थी, खा गयी". यानी अल्लाह अपने वादे को पूरा करने मे विफल रहा. यही कारण है की कुरआन में छोटे- छोटे जुर्मो की सजा मौजूद है पर व्यभिचार की सजा पत्थर मार कर मृत्युदण्ड सिरे से मौजूद नहीं. 

सबसे पहली बात तो
मैं बताता रहता हूँ, और फिर बता रहा हूँ कि कुरान की प्रमाणिकता को मुस्लिम लोग हदीसों के आधार पर सुनिश्चित नहीं करते बल्कि हदीस की प्रमाणिकता को कुरान के आधार पर सुनिश्चित करते हैं ... और कुरान मे जब अल्लाह ने इसकी सुरक्षा का वादा कर लिया है तो इसके विपरीत जाने वाली ऐसी किसी हदीस की कोई प्रमाणिकता, कोई अर्थ नहीं रह जाता 

इसी कारण इस हदीस को अनेक विद्वानों ने अप्रमाणिक करार दिया है, इसका एक प्रमुख कारण ये बताया गया है, कि क्योंकि ये हदीस केवल अम्मी आएशा रज़ि. से रिवायत की गई है अत: ये 'खबर ए वाहिद' यानि केवल एक व्यक्ति द्वारा कही गई बात है, और सभी इस्लामी धार्मिक विद्वानों का मत है कि कुरान के विरुद्ध खबर ए वाहिद मान्य नहीं है ॥
पर यदि इस हदीस को हम सहीह ही मान लें , तो भी क्या ये सिद्ध होता है कि कुरान अधूरी है ??
हरगिज़ ऐसा कुछ सिद्ध नहीं होता ....

हमें पता है कि नबी स. के जीवनकाल मे ही लोग कुरान का पाठ करने के उद्देश्य से नबी स. पर अवतरित होने वाली कुरान की सभी आयतों का व्यक्तिगत रूप से संकलन करते थे ... जो कि इसी प्रकार सम्भव था कि नबी स. पर अवतरित होनेवाली हर आयत की अनेक प्रतिलिपियां बना ली जाएं ... 
आपको ये भी पता होगा ऐतिहासिक तथ्य ये है कि उस समय के लोगों ने लगभग सात अलग अलग प्रकार की कुरान लिख ली थीं, जो कि हज़रत उस्मान ग़नी रज़िअल्लाहु अन्हु के ख़िलाफ़त के दौर तक भी मौजूद थीं... तो सहज प्रश्न उठता है कि यदि अम्मी आएशा रज़ि. के यहाँ रखी कुरान की दो आयतें बकरी खा गई ... तो क्या यही बकरी कुरान की वो अनेक प्रतियां और सात प्रकार भी खा गई थी जो अन्य सहाबा के घर मे थे ... स्पष्ट है एक बकरी एक स्थान पर रखी हुई कुरान की ही दो आयतें खा जाती, तो उससे भी कुरान अधूरी नही हो सकती थी , क्योंकि उन आयतों की प्रतिलिपियां अन्य सहाबियों के पास तब भी सुरक्षित रखी हुई थीं 
पवित्र कुरान की अंतिम आयत का अवतरण नबी स. के देहावसान से तीन महीने पूर्व हुआ था वो आयत सूरह मायदा की थीं , यानि रजम और दुग्धजातता की आयतें इस से भी कुछ समय पूर्व अवतरित हुई थीं और उन आयतों की नकल बनाने के लिए सहाबा के पास पर्याप्त समय था यदि वो आयात कुरान मे शामिल की जाने वाली होती...

ये भी तथ्य है कि नबी स. के जीवनकाल से ही अनेक सहाबा ने नबी स. की सहायता से सम्पूर्ण कुरान को कंठस्थ किया था , तो क्या ये हो सकता है कि वही बकरी सहाबा की स्मृति से भी कुरान पाक की वो दो आयतें खा गई थी ?? 

पर वास्तविकता ये है कि वे वाक्य कुरान का हिस्सा नहीं थे बल्कि उस समय के लोगों के लिए विधान थे क्योंकि उस समय के कानून को अल्लाह ने एक झटके से नहीं बल्कि धीरे धीरे बदला 

उदारणस्वरूप शराब या मुताह सम्बन्धी विधान... शुरू मे मुताह यानी कॉन्ट्रेक्ट मैरिज की अनुमति नबी स. ने मुस्लिमों को यदि दी थी तो वह ईश्वरीय अभिप्रेरण से ही दी थी ... पर कुछ समय बाद मुताह को इस्लाम मे नबी स. ने ईश्वरीय अभिप्रेरण से प्रतिबंधित कर दिया ... ये सभी बदलने वाले विधान हदीस मे तो बयान किए गए हैं क्योंकि हदीस एक ऐतिहासिक अभिलेख है, पर कुरान मे केवल अंतिम शब्द और सुदृढ़ आयतें ही अवतरित हुई हैं ... ताकि आने वाली तमाम नस्लो के लिए कुरान एक सुस्पष्ट हिदायत हो, और कुरान पढने वालों को उसे पढ़कर कोई दिग्भ्रम न हो ॥

नबी स. जानते थे कि रजम का विधान कुरान का अंग नहीं थे.. इसी कारण स्वयं नबी स. ने रजम से सम्बन्धित आयतों को कुरान मे लिखने से रोका ऐसा कुछ एक हदीस से सिद्ध होता है कि सहाबा ने रजम सम्बन्धी विधानों (जो सम्भवत: इन्जील की आयतें थीं, व जिनके अनुपालन की नबी सल्ल. ने उन समय के लोगों को शिक्षा दी थी) को कुरान मे लिखने की अनुमति चाही पर नबी स. ने उन्हें इस बात की इजाज़त नहीं दी ... (मुस्तदरिक़ अल हाकिम मे हदीस नम्बर 8184 पर हजरत ज़ैद बिन साबित रज़ि. की रिवायत, हाकिम ने इसे सही प्रमाणित किया है)

स्पष्ट है कि नबी सलल्लाहो अलैहि वसल्लम ही जानते थे कि कौन सी बात कुरान का अंग है और कौन सी बात नहीं, सहाबा ए किराम इस विषय मे खुद नहीं जानते थे बल्कि वो केवल नबी सल्ल. के बताए अनुसार कुरान को लिपिबद्ध करते थे...
नबी स. ने रजम सम्बन्धी विधान को कुरान मे लिखने से रोका इसका साफ अर्थ है कि रजम का विधान यानी व्यभिचारी को पत्थर मार मार कर मृत्युदण्ड देने का विधान हर समुदाय और हर परिस्थिति के लिए न होकर केवल उस समुदाय और उस जैसी परिस्थितियों के लिए था ... जहाँ के लोग रक्तपात के आदी थे और बेहद सख्त दिल के थे जो किसी की साधारण ढंग से मृत्यु होते देखकर भी विचलित नहीं होते थे तो उनको भयाक्रान्त करने को उस समय रजम की सजा कायम रखी गई
क्योंकि इस्लाम मे हुदूद की सजाओं का एक मुख्य मकसद ये है कि उस सख्त सजा से समुदाय के व्यक्ति डर जाएं और पापकर्म से खुद को इस डर के कारण रोक लें

पर जो समुदाय ऐसे रक्तपात का आदी और सख्तदिल न हो उसमें वैवाहिक व्यभिचार, बलात्कार जैसे अपराध, जिन्हें इस्लामी विधि मे समाज मे अव्यवस्था पैदा करने वाले अपराध माना जाता है, ऐसे अपराधों के लिए किसी भी अन्य प्रकार से दण्ड दिया जा सकता है, जो कम वीभत्स लगे ... 
धरती मे अव्यवस्था पैदा करने वाले इन अपराधों की गम्भीरता के अनुसार मृत्युदण्ड आदि के विधान कुरान 5:33 मे स्पष्ट रूप से वर्णित हैं, जो दण्ड रजम या अन्य किसी विधि से दिया जा सकता है ॥

इसी तरह दुग्धजात सम्बन्ध के विषय मे विधान धीरे धीरे बदले ऐसा अम्मी आएशा की सही मुसलिम मे नम्बर 2634 पर वर्णित हदीस से ज्ञात होता है कि पहले 10 बार दूध पीने से व्यक्ति स्त्री का महरम होता था, फिर उस नियम को केवल पांच बार से बदल दिया गया ( सम्भवत: नियम धीरे धीरे इसलिए बदले गए, ताकि इस्लाम लाने से पूर्व जो लोग अपनी पत्नियों के साथ ऐसा कर्म कर चुके हैं, तो अपने पूर्व की अज्ञानता के कारण उन्हें अपनी पत्नी का त्याग न करना पड़े ..)
फिर इसके बाद जब इस्लामी विधान के अनुसार लोगों ने अपने को ढाल लिया तब पांच बार का नियम भी केवल एक बार ही दूध पिला देने से बदल दिया गया, ये हमें मलिक मोवत्ता किताब 30, हदीस 4 और 6 से ज्ञात होता है. हजरत यह्या रज़ि. फरमाते हैं कि दुग्धजात सम्बन्ध केवल दो वर्ष से कम आयु के बालकों को और केवल एक ही बार दूध पिलाने से स्थापित हो जाता है "
स्पष्ट है कि यही अंतिम विधान है और इसी को कुरान मे सम्मिलित किया जाना था न कि 10 या 5 Suckling का विधान ।
दुग्धजात सम्बन्ध की सदैव रहने वाली ये शर्त कुरान (4:23) मे मौजूद है, कि एक मुस्लिम के लिए सभी दुग्धजात स्त्रियाँ और लड़कियां विवाह के लिए अवैध हैं !

इन सारे तथ्यों के सामने होने के बाद, ये जानने के बाद कि हर किस्म का विधान कुरान मे मौजूद है क्या कोई ये कह सकता है कि कुरान अधूरी रह गई या सुरक्षित नही रही ??
 

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