हलाला क्या है।

हलाला का कानून हक़ीक़त में क्या और क्यों है....
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.....क़ुरान शरीफ़ के मुताबिक तलाक़ न तो एक झटके में दी जा सकती है, न बिना सोचे समझे, बल्कि तलाक़ के मामले पर बहुत ठन्डे दिमाग से कई महीनों तक सोचने विचारने का हुक़्म अल्लाह ने दिया है, और तलाक़ के दरम्यान 3 महीने भी फैसला लौटाने की मोहलत दी गई है, लेकिन अल्लाह के इन अहकाम को भुला कर आज हमारे मुआशरे में तलाक़ एक झटके में दी जाने लगी है, और एक झटके में तलाक़ का मतलब ये होता है कि इस मामले में अब सोचने समझने का कोई ज़िक्र ही नहीं रहा, और जब इस मामले में सोचने समझने की ज़रूरत को भुला दिया गया है, तो तलाक़ के मामलात बढ़ने लाज़मी ही थे, फिर बिना सोचे दी गई तलाक़ के बाद होश में आने पर आदमी वापस अपनी बीवी को पाने के लिए ज़ोर लगाने लगता है तो हलाला को प्लान किया जाता है, और इस तरह बिना क़ुरान पाक़ की आयतों का मक़सद समझे प्लान हलाला के केस भी समाज में बढ़ जाते हैं...... फिर जब किसी समाज में तलाक़ और प्लान हलाला की भरमार हो तो सवाल उठने लाज़मी ही हैं
....... अगर इस मामले में क़ुरान पाक की तालीम को माना जाता तो तलाक़ ही न के बराबर होते, और अगर होते तो इतना सोच समझकर होते कि वापस उन्हीं औरत मर्द को आपस में शादी की इच्छा ही नही होती... और अगर ये इच्छा होती भी तो क़ुरान व अहादीस की तालीम के मुताबिक हलाला प्लान करना हराम है, बल्कि अब वो शख्स सिर्फ ये इन्तज़ार कर सकता है कि शायद उसकी तलाकशुदा अपना नया घर बसाने के लिए ( हलाला के लिए नहीं ) नई शादी करे , और फिर शायद कभी उसका दूसरा शौहर उससे बेजार होकर उसे तलाक दे दे, तभी पहले शौहर की शादी उस औरत से हो सकती है, वरना नही
यानि इस्लाम की तालीम पर चलने से प्लान हलाला निकाह जैसा कोई टर्म ही न पैदा होता,
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.... बहरहाल, आज इस्लामी तालीम से दूरी ने प्लान हलाला निकाह को भी पैदा कर दिया है, और इसकी सफाई में अजीब अजीब बातें भी..... वैसे प्लान हलाला की सफ़ाई में जो बात कही जाती है कि ये "तलाक़ देने के बाद फिर से अपनी बीवी को चाहने वाले मर्द को सज़ा है" ये कॉन्सेप्ट पूरी तरह गलत है, सही बात ये है कि हलाला (प्लान हलाला नही) का कानून अल्लाह ने तलाक़ होने के बाद सज़ा के तौर पर नही बल्कि तलाक़ होने से पहले तलाक़ को रोकने के लिए आदमी के दिमाग में एक चेतावनी बैठाने के लिये बनाया है.... क्योंकि इंसान की ये प्रकृति है कि किसी काम को करने का निश्चित अप्रिय परिणाम उसे मालूम हो तो बहुत ज़रूरी होने पर ही वो उस काम में हाथ डालता है, और पूरे वक़्त उसका दिमाग उस काम के अप्रिय परिणाम को रोकने के बारे में भी गम्भीरता से सोचता है.... जबकि किसी काम के परिणाम अपने लिये गम्भीर न दीखते हों तो इंसान दूसरे का हित सोचे बगैर लापरवाही से काम करता है...
...तो हलाला के कानून के पीछे अल्लाह की हिकमत ये है कि तलाक़ देने से पहले तलाक़ की गम्भीरता को लोग समझें और तलाक़ देने के दरमियान भी सोच विचार करके तलाक़ को रोक सकें तो रोक लें कि दो मौकों पर तलाक़ कह भी चुके हों तो तीसरी बार ये लफ्ज़ कहने से बचें, वरना अपनी बीवी से वो हमेशा के लिए जुदा हो जाएंगे....
... तो ये है हलाला कानून का सही मक़सद, और इस कानून का मकसद तभी पूरा होगा जब तलाक़ के मामले में इंसान एक झटके में फैसला लेने की बजाए इस फैसले पर सोच विचार करने और फैसले को बदलने के लिये एक ठीक ठाक वक़्त की मोहलत पाए, जो मोहलत अल्लाह ने क़ुरान पाक में दे भी रखी है, ज़रूरत उस पर अमल करने की है !!

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