इस्लाम और जबरन धर्म परिवर्तन

“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो, फिर यदि वे तौबा कर लें, नमाज कायम करें, और जकात दें तो उनका रास्ता छोड़ दो ” (Al Qur’an 9:5)

हमारे एक भाई का सूरह तौबा की आयत नम्बर पांच के बारे मे कहना है कि इससे साबित हो रहा है कि अगर मुसरिक ईमान ले आए तो जान बक्श दो यदि नहीं तो मार दो

सबसे पहले मैं भाई की मुख्य शंका दूर करना चाहूंगा कि कुरान 9:5 का ये आदेश मुस्लिमों को इसलिए नहीं था कि वे दूसरे समुदायों पर हमले कर के उन्हें पराजित कर के जबरन उनका इस्लाम मे धर्मान्तरण कर के इस्लाम का प्रसार करें, बल्कि 9:5 का आदेश, पहले भी बहुत बार बता चुका हूँ इसलिए था, ताकि मुस्लिम अपने ऊपर हमले करने वाले गैर मुस्लिमों के हाथों इस्लाम का समूल नाश होने से बचा सकें, दूसरे शब्दों मे कहूँ तो ये और ऐसे अन्य युद्ध के आदेश इस्लाम के प्रसार के लिए नहीं बल्कि काफिरों के हाथो से मुस्लिमों की प्राणरक्षा हो सके इसलिए थे ॥

फिर भी यदि एक बार को मान लिया जाए कि कुरान के ये आदेश इस्लाम के क्रूरतापूर्वक प्रसार के लिए ही दिए गए थे तो फिर ध्यान कीजिए कि भारत मे 711 ईस्वी मे सिंध पर मुहम्मद बिन कासिम की चढाई के समय से 1857 तक यानी साढ़े गयारह सौ सालों तक मुस्लिमों का लगातार शासन रहा ... और भारत मे आने वाले हर मुस्लिम सेनापति के समक्ष भारतीय शासकों की पराजय होती रही ... इसके बावजूद मुस्लिमों ने पराजित राज्यों के सामने मृत्युदण्ड या इस्लाम मे से एक विकल्प चुनने को क्यों नहीं बाध्य किया, क्योंकि यदि उन्होने बाध्य किया होता तो 1100 वर्षों की अवधि से बहुत पहले ही भारत से अन्य सभी धर्मों का नामोनिशान मिट चुका होता और भारत मे केवल इस्लाम के अनुयायी होते लेकिन हुआ क्या ... आजादी से पहले भी अविभाजित भारत मे मुस्लिमों की आबादी, भारत की कुल आबादी के चौथाई से भी कम थी ... ऐसा क्यों ? मुस्लिम भारत की आबादी मे इतने कम क्यों रह गए, कुरान के उस "बाध्यकारी" आदेश और 1100 वर्षों के सुदीर्घ "अन्यायपूर्ण" इस्लामी कब्जे के बावजूद ??

.... जरा गलतफहमी की चादर हटाइए, और देखिए, 1001 ईस्वी के बाद भारत के उद्भाण्डपुर पर आक्रमण कर के जयचन्द को पराजित करने वाले महमूद गज़नवी ने जयचन्द के आगे इस्लाम या मौत मे से कोई एक विकल्प चुनने को नहीं कहा, बल्कि जयचन्द के साथ एक सन्धि की थी, ... इसी तरह दिल्ली के पृथ्वीराज चौहान को पराजित करने वाले मोहम्मद गौरी ने साक्ष्यों के आधार पर , न तो चौहान को मारा न मुस्लिम बनाया, बल्कि अपने अधीन शासक बनाया, ... और सबसे कट्टर मुस्लिम शासक औरंगज़ेब को ही देखिए , इन्होंने भी युद्ध मे कमजोर पड़े शिवाजी के साथ पुरन्दर की विख्यात संधि की थी, बजाय उनके धर्मान्तरण या हत्या किए.... क्या आपके विचार से बादशाह औरंगज़ेब ने भी अपने धर्म का पालन नही किया ??
क्या कारण था कि भारत मे हिन्दू संस्कृति सबसे ज्यादा बढ़ावा उन्हीं मुस्लिम शासकों ने ही क्यों दिया जिनका धर्म तमाम पराजित गैर मुस्लिमों की हत्या या जबरन धर्मान्तरण की शिक्षा देता था ....?? ... सोचिए, और सोचते रहिए

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तो बात सूरह तौबा की आयात की जो कि उस युद्ध की नौबत जो कि मुश्रिक ही पैदा करते थे, आने के बाद की परिस्थिति आ जाने के बाद की हैं, ... कि जब मुस्लिमों द्वारा युद्ध से बचने के भरसक प्रयासों के बाद भी युद्ध होने लग जाए तो केवल एक नहीं बल्कि तीन रास्ते बताए गए हैं, उन लोगों के उत्पात को मिटाने के लिए जो लोग मुस्लिमों के समूल नाश के लिए मुस्लिमों के साथ खून खराबा करते थे और जबरन मुस्लिमों को बहुदेववादी बनाने का हर गलत हथकण्डा अपनाते थे ...

1- पहला विकल्प, जब युद्ध के चलते ही चलते कोई मुश्रिक बिना अपना पूर्व धर्म बदले युद्ध छोड़ना चाहे तो उसे युद्ध क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकाल देने का आदेश मुस्लिमो को दिया गया (9:6)

2- दूसरा विकल्प, उन लोगों के लिए जो युद्ध मे अनेक मुस्लिमों की हत्या कर चुकने के बाद फिर मुस्लिमों के हाथों पराजित हो जाने के बाद यदि दण्ड से बचने को ही वे गैरमुस्लिम मुस्लिमों को ये विश्वास दिला दें कि वे अपने पूर्व मे किए गए पापों पर पश्चाताप कर रहे हैं, और अब वे इस्लाम स्वीकार कर रहे हैं, तो ऐसे लोगों को भी माफ कर देने का आदेश मुस्लिमों को दिया गया, (9:5)
ये कोई बाध्यता नहीं बल्कि एक छूट थी उन अपराधियों के लिए वो इस कारण क्योंकि स्वयं इस्लाम स्वीकार कर के वो गैरमुस्लिम, मुस्लिमों के विरुद्ध भविष्य मे कभी कोई युद्ध किए जाने की सारी सम्भावनाओं को खत्म कर देने को आश्वस्त करते हैं .... यहाँ एक बात और ध्यान देने की है कि इस्लाम स्वीकारने या न स्वीकारने का फैसला पूरी तरह से उन गैर मुस्लिमों की मर्जी का फैसला होगा ...न कि मुस्लिम उन्हें विवश कर सकते हैं, क्योंकि अल्लाह का ये आदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि किसी को विवश कर के इस्लाम कुबूल कराने की कोई आवश्यकता नहीं है, अल्लाह जिसे चाहता है वो व्यक्ति केवल समझाने मात्र से मुस्लिम बन जाता है .... पवित्र कुरान मे लिखा है
"अगर तुम्हारा रब्ब चाहता, तो इस धरती मे जितने लोग हैं, वे सारे के सारे ईमान ले आते . फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे ईमान वाले बन जाएं ?" 
[ पवित्र कुरान 10:99 ]

3- तीसरा विकल्प उनके लिए जो मुस्लिमों की हत्या युद्ध मे कर चुके हैं, फिर पराजित होकर मुस्लिमों के कब्जे व मुस्लिमों के रहमो करम पर आश्रित हो चुके हैं, और बिना किसी अन्य विकल्प का चुनाव किए, दण्ड पाने के लिए तैयार हैं, ... तो फिर मुस्लिमों को अल्लाह के आदेशानुसार उन्हें दण्ड देने का अधिकार है, यानी मुस्लिमों के हत्यारों का दण्ड मौत की सजा, व उन हत्यारों का सहयोग करने वालों को बंदी बनाना ... ये दण्ड पूरी तरह न्यायसंगत है , तिसपर भी अल्लाह का आदेश कि "बुराई का बदला वैसी ही बुराई है, लेकिन जो माफ कर दे और सुधार करे तो उसका बदला अल्लाह के ज़िम्मे है, बेशक वो ज़ालिमो को पसन्द नही करता” (पवित्र कुरान, 42:40)
... ये आदेश मुस्लिमों को उन हत्यारों को भी क्षमा कर देने के लिए प्रेरित करता है, और वे अल्लाह की कृपादृष्टि पाने की आशा मे जालिमो को भी माफ कर सकते हैं ।
 

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