उमर बिन अब्दुल अज़ीज़

उमर बिन अब्दुल अज़ीज़..!
उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्ला अलैहि जिन्हें उम्र शानी भी कहा जाता है, उनके अद्लो इंसाफ़ की मिशालें आज तक बयान किया जाता है.!
सल्तनत का आलम ये है कि तीन बर्रे आज़म पर हुकूमत थी और कोई ज़कात लेने वाला न था, उनकी हुकूमत दमिश्क से दीपालपुर कश्मीर तक दमिश्क से काशगर चीन तक, दमिश्क से सेनेगल चाड तक और दमिश्क से दक्षिण फ्रांस तक लाखों वर्ग मील थी, और यह आलम था कि लाखों वर्ग मील में कोई ज़कात लेने वाला न था। लेकिन अपना घर खाली था, ईद का मौका है बारह बच्चे हैं और पहनने को कपड़े नहीं हैं, बच्चे माँ के पास आते हैं कि हमें अब्बा से कहकर कपड़े तो मंगवा दें, माँ यानी फ़ातिमा बिन्ते अब्दुल मलिक सात निसबतों से शह ज़ादी हैं, उनके दादा खलीफा बने उनके वालिद अब्दुल मलिक खलीफा बने, उनके चार भाई खलीफा बने, और उनके शौहर उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्ला अलैहि खलीफा बने..!
और उनके वालिद अब्दुल मलिक अपनी बेटी को हीरे में तौलते थे, अब आलम यह है कि बच्चों के पास ईद पर पहनने के कपड़े नहीं हैं, शाम को उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्ला अलैहि घर आए तो बेगम ने कहा "ईद आ रही है बच्चे कपड़े मांग रहे हैं।"तो फ़रमाते लगे "फातिमा! मेरे पास तो पैसे नहीं हैं, "तीन तीन बर्रे आज़म में ज़कात लेने वाला कोई नहीं है, और खलीफा के पास बच्चों की ईद के लिए पैसे नहीं है। फातिमा ने कहा "मेरे पास एक तरकीब है कि आप अगले महीने की तंख्वा एडवांस ले लें उनसे बच्चों के कपड़े सी लेते हैं, अगले महीने घर में ऊन साफ करके या छोटी मोटी मजदूरी करके घर का खर्च चला लूंगी..!
अल्लाहु अकबर ये खातून अव्वल फरमा रही हैं कि मैं छोटी मोटी मजदूरी करके खर्च चला लूंगी, तो अगले महीने की तंख्वा ले लें। उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्ला अलैह ने सहमति जताई और बाहर निकले, जाकर अपने खजांची से मिले और कहा! "भाई मुझे अगले महीने की तंख्वा एडवांस में दे दो बच्चों के लिए ईद के कपड़े लेने हैं। "आप मुलाहिज़ा किजिए कि लाखों वर्ग मील के हाकिम अपने खजांची से एडवांस तंख्वा मांग रहा है, हालांकि वो खजांची भी उनके मातहत है, आप चाहते तो हुकमिया लहज़ा अपना सकते थे लेकिन नहीं वो उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ थे। मिज़ाज भी उनका तर्बियत य़ाफ़ता था, उसने जवाब दिया "अमीरुल मोमिनीन आप अगले महीने की तंख्वा मांग रहे हैं, आप मुझे लिखकर दे दें की आप एक महीने ज़िन्दा रहेंगे? मै आपको पैसे दे देता हूँ। "सुबहान अल्लाह! यानी खजांची भी तर्बियत याफ्ता था वह भी अपने पेशे से बेईमानी नहीं कर रहा था, इंसान फानी है उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ अगर एक महीने की तंख्वा ले लेते और मर जाते, एक महीने काम नहीं कर पाते तो वो पैसे हराम कहलाता क्योंकि काम जो नहीं कर पाए। उमर बिन अब्दुल अजीज रहमतुल्ला अलैहि घर लौट आते हैं फातिमा से फ़रमाते हैं "फातिमा! मेरे बच्चों को कह दो में उन्हें ईद के कपड़े नहीं ले कर दे सकता..!
ईद की नमाज हुई सारे सरदरान मिलने आए, वहीं उमर बीन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्ला अलैह के बच्चे भी उन्हीं पुराने कपड़ों में बैठे थे, उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने अपने बच्चों से कहा! "आज तुम्हें अपने वालिद से गिला तो होगा कि ईद के कपड़े नहीं ले कर दे सका। "उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ के एक बेटे का नाम अब्दुल मलिक था जो उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्ला अलैहि की ज़िन्दगी में ही मर गया था, उन्होंने जवाब दिया "नहीं अब्बा! आज हमारा सिर ऊंचा उठा है हमारे वालिद ने खयानत नहीं की। "घर आए तो बच्चियां मुंह पर कपड़ा रखकर बात कर रही थीं, पूछा मुंह पर कपड़ा रखकर क्यों बात कर रही हो? बेटियों ने जवाब दिया आज हमने कच्चे प्याज से रोटी खाई हम नहीं चाहते हमारे मुंह से आने वाली प्याज की बदबू से आपको परेशानी हो। उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्ला अलैहि रोने लगे और कहा!"मेरी बच्चियों कोई बाप अपनी औलाद को दुख नहीं देना चाहता, मैं चाहूँ तो तुम्हें शहंशाही ज़िन्दगी दे दूं लेकिन मैं तुम्हारे लिये जहन्नुम की आग नहीं खरीद सकता, "ये तीन बर्रे आज़म के खलीफा हाकिम के घर का हाल है कि ईद के कपड़े नहीं, खाना कच्चा प्याज़ है..!
रजब 101 हिजरी जनवरी 720 में आप बीमार पड़ गए, कहा जाता है कि बनू उमय्या आप एक खादिम को एक हज़ार मोहरें देकर आपको जहर दिलवा दिया था, आपको बीमारी के दौरान ही उसका इल्म हो गया था, लेकिन आपने गुलाम से कोई बदला नहीं लिया बल्कि मोहरें इससे लेकर खज़ाने में जमा करा दी और गुलाम को आज़ाद कर दिया। ज़हर देने की वजाहों में एक तो यह बात शामिल थी कि आप चारों खलीफा की तरह खिलाफ़त चलाते थे। दूसरी यह कि उनकी वजह से बनू उमय्या अपनी लूट-फाट नहीं कर सकें, क्योंकि उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्ला अलैहि बैतुल माल को मुसलमानों की अमानत समझते थे..!
तबियत बहुत खराब हो गई तो आप अपने बाद होने वाले खलीफा यज़ीद बिन अब्दुल मलिक के नाम वसीयत लिखवाई जिसमें उन्हें तकवा की हिदायत की। 25 रजब 101 हिजरी 10 फ़रवरी 720 ईसवी को आपने अपनी हयात पूरी कर ली। इस वक्त आपकी उम्र सिर्फ 40 साल थी। आप हलब के पास देर सम आन में सुपुर्दे खाक किया गया जो शाम में है..!
उनका जब इंतेकाल हुआ उन्हें कब्र में उतारा गया, राजा कब्र में उतरे वसीयत के मुताबिक उनके कफन की गाँठ खोलकर देखा गया, राजा ने कहा मैंने देखा "उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ का चेहरा क़िबले की ओर था, और चौदहवीं के चाँद की तरह चमक रहा था ऐसा लगता था चौदहवीं का चाँद कब्र में उतर आया हो" ऐसे थे हमारे बाप ऐसे थे हमारे बड़े, ज़रा सोचिए ख़ुद सोचिए!

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