इस्लाम पर एक अश्लील आरोप

हमारे एक मित्र बहुत समय से ये हदीस हमें इनबाक्स कर के ये सिद्ध करना चाहते हैं कि इस्लाम मे युवा स्त्रियों को पराए पुरूषों से निकटता बढ़ाने के लिए उन्हें अपना दूध पिलाने का अश्लील सुझाव देता है ..... मुझे लगता है भाई की ऐसी सोच बनी तो इसमें उनसे ज्यादा खुद ऐसे मुस्लिमों का दोष है जो अपनी कम सोच का प्रयोग कर के उल्टे सीधे फतवे देकर इस्लाम का मजाक उड़वाया करते हैं । ऐसा ही एक फतवा वर्ष 2010 मे सऊदी सरकार मे न्याय मन्त्रालय के एक परामर्श दाता शेख अल हुसैन आवेखान ने दिया थ कि कामकाजी स्त्रियाँ अपने सहकर्मियों को अपना दूध पिला दें, ताकि वो उनके महरम हो जाएं ... अपनी बात के पक्ष मे आवेखान ने यही हदीस दी थी जो आज मेरे भाई मुझे दिखा रहे हैं ।
इस फतवे के पूरी तरह गैर इस्लामी होने के बावजूद उस समय इस्लाम का खूब मजाक बना... दोष किसका था ?? 

बहरहाल मोवत्ता इमाम मलिक किताब-30 , हदीस 1287 मे इस मामले पर विस्तार से लिखा गया है जिससे मामले का ये खुलासा होता है कि हजरत सालिम को उनकी शिशु अवस्था से ही अबू हुज़ैफा और उनकी बीवी सहला बिन्त सुहैल ने गोद लेकर अपने बच्चे की तरह भरपूर मोहब्बत से पाला था और सालिम उनके घर मे ऐसे ही रहते थे जैसे आप सब अपनी मां के साथ रहते हैं ....

लेकिन जिस समय सालिम ने किशोरावस्था मे कदम रखा यानि 11-12 वर्ष के हुए, उसी समय कुरान की ये आयत अवतरित हो गई कि गोद लिये हुए बेटों को अपना बेटा न कहो , और मुंहबोले रिश्ते शून्य सिद्ध कर दिए गए , तो इनके बीच परदे आदि की मर्यादाएं मानने की शर्त आ गई ।
पर क्योंकि सहला रज़ि. सालिम रज़ि. को बिल्कुल अपने सगे पुत्र की तरह प्रेम करती थीं इसलिए वो ये उपाय पूछने नबी स. के पास आईं कि किस तरह वो एक अनजान बच्चे को गोद लेकर उसे अपने सगे बेटे की तरह रिश्ता रख सकती हैं, ऐसा रिश्ता जिसमें अनावश्यक परदे द्वारा मां बेटे के रिश्ते मे असहजता और परायेपन का तनिक भी एहसास न आने पाए

मनोविज्ञानी ये सिद्ध कर चुके हैं कि जो बच्चे अपनी माता का दूध पीते है, वे उन बच्चों की अपेक्षा अपनी मां से ज्यादा भावनात्मक लगाव रखते हैं, जिन्हें उनकी मां अपना दूध नहीं पिलाती..

इन्हीं अनुभूतियों के साथ जब बच्चा बड़ा होता जाता है तो उसके मन मे माता के लिए सम्मान भी बढता जाता है... और वो व्यक्ति कभी उस स्त्री की अपमानजनक स्थिति मे कल्पना भी नहीं कर सकता जिस स्त्री ने उसे अपना दूध पिलाया है .... इन्हीं भावनाओं और मर्यादाओं को इस्लाम ने ये नियम बनाकर और प्रगाढ़ किया कि स्त्री के दुग्धजात पुत्र को उसके सगे पुत्र की तरह महरम ठहरा दिया और एक स्त्री ने जितने बच्चों को दूध पिलाया उनमें आपस में कोई रक्त सम्बन्ध न होने बिल्कुल सगे भाई बहन सा मान लिया
तो नबी स. ने यही युक्ति सहला बिन्त सुहैल को सुझाई कि वे अपना दूध सालिम रज़ि. को पिला दें जिससे वे दोनों धर्म के अनुसार सगे मां बेटे बन जाएंगे और सहला रज़ि. और उनकी दुग्धजात पुत्रियां एवम् वे सभी स्त्रियाँ सालिम के लिए महरम हो जाएंगी जो खून के रिश्ते मे महरम होती हैं , व सालिम सहजता से सगा पुत्र बनकर सहला रज़ि. के घर मे रह पाएंगे .... और सहला रज़ि. ने एक प्याले मे डालकर अपना दूध अपने बेटे को पिला दिया 

तो देखिए यहां पर पुरुष को दूध पिलाने की स्थिति विशेष और अद्वितीय परिस्थितियों मे आई यानी अपने बच्चे को खुद से दूर न जाने देने की चाह मे, न कि किसी गैर पुरुष को करीब करने के लिए .... ये परिस्थिति दोबारा अब कभी न बनेगी क्योंकि इस्लाम के सारे विधान अब स्पष्ट रूप से बन चुके हैं, अब किसी अनजान अबोध बालक को गोद लेने वाली स्त्री को पहले से पता है कि उस बालक को सदा के लिए अपना और अपनी बेटियों का महरम बनाने के लिए स्त्री को उसे अपना दूध पिलाना चाहिए, जिस समय हजरत सालिम रज़ि. को सहला बिन्त सुहैल और अबू हुज़ैफा ने गोद लिया था , उस समय किसी को भी इस्लाम का ये नियम पता न था वरना हजरत सालिम को शैशवावस्था मे ही दूध पिला दिया होता ... 

खैर किशोरावस्था मे प्याले मे सालिम रज़ि. को कटोरी मे दूध पिलाना मजबूरी की बात थी, यदि नबी स. ने ये युक्ति सहला रज़ि. को न सुझाई होती, तो सहला रज़ि. को अपने पति के कारण अपने बेटे का त्याग करने की बड़ी पीड़ा भोगना पड़ती ...

अन्य कई हदीस से सिद्ध है कि दुग्धजात सम्बन्ध वही कहलाएगा जब दो वर्ष से कम के बालक को स्त्री दूध पिलाए, इससे बड़े बालक को दूध पिलाने पर भी वो ना-महरम यानी पर-पुरूष ही रहेगा [मोवत्ता, किताब-30, हदीस- 1278,1280, 1284,1285, 1286, 1288 और 1289] यानी सालिम रज़ि. का ये मामला अपने आप मे अकेला था, और अकेला ही रहेगा ।

हालांकि उम्मुल मोमिनीन आएशा सिद्दीका रज़ि. ने पर-पुरूषो को अपना बेटा बनाने का इस तरीके को अच्छा आइडिया माना व दो वर्ष से कम के जिन लड़कों को उन्होंने बेटा बनाना चाहा उसे अपनी बहन भतीजी का दूध पिलाकर अपना महरम कर लिया सम्भवत: इसलिए क्योंकि हजरत आएशा रज़ि. मुस्लिमों धार्मिक गुरु थीं और धार्मिक ज्ञान की बहुत सी शिक्षाएं जिनमे शर्म निहित थी आप रज़ि. पर-पुरूषो को नहीं दे सकती थीं ,पर अपने बेटों को बेझिझक दे सकती थीं, इसलिए बचपन मे उन्हें अपने लिए महरम बना लिया ताकि जब वे युवा हों तो हदीस सीखकर उसे आगे बढ़ा सकें ।

इस युक्ति से अकारण किसी गैर पुरुष को अपने निकट करने की बात पर नबी स. की अन्य सभी पवित्र पत्नियों का ये बयान था कि "ऐसा हुक्म (किशोर लड़के को दूध पिलाना ) सिर्फ नबी स. ने विशेष परिस्थितियों के कारण सालिम रज़ि. के मामले मे दिया था ... अन्य पर-पुरूषो को इस युक्ति का प्रयोग कर के निकट करना बिल्कुल अस्वीकार्य है ।"

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