औरत और इस्लाम 1

{{{ औरत और इस्लाम }}} भाग 1

अगर इंसानी समाज एक घर की तरह है तो एक परिवार उस घर की एक ईंट की तरह होता है, इन छोटी छोटी बहुत सारी ईंटों से मिल कर ही एक समाज बनता है! जैसी अच्छी या बुरी यह ईंटे होती हैं इनसे बनने वाला समाज भी ऐसा ही अच्छा या बुरा होता है!
यह परिवार ही होते हैं जहाँ नई नसले तैयार होती हैं और तरबियत (शिष्टाचार) हासिल करती हैं! आप स्कूल कॉलेज में ज़्यादा से ज़्यादा डिसिप्लिन सिखा सकते हैं, अच्छे डॉक्टर इंजीनयर वेज्ञानिक बना सकते हैं, मदरसों में आप बड़े आलिम बना सकते हैं, लेकिन इंसान घर में बनते हैं! एक अच्छा इंसान बनाने में सबसे ज़्यादा रोल माँ का होता है, क्यों कि बच्चा सबसे ज़्यादा वक़्त उसी के साथ गुज़ारता है, उसी से सबसे ज़्यादा प्यार करता है और उसी की बातों को सबसे ज़्यादा समझता है! उसके बाद बाप और उसके बाद दूसरे करीबी रिश्ते दारों का रोल होता है!
दूसरी बात यह है कि आप इंसान की इस 70-80 साल की ज़िन्दगी को देखें तो पाएं कि वह पैदा इस हाल में होता है कि बिलकुल बेजान होता है! वो उठ कर बैठना तो दूर किसी चीज़ के लिए हाँ या ना भी नहीं कर सकता! उस हालत में उसे कोई ऐसा चाहिए होता है जो उसकी तकलीफ को महसूस कर सके, उसकी ख़ुशी में खुश और उसके दुःख में दुखी हो सके, उसके लिए रातों को उठ सके!
उसके बाद वह कुछ बड़ा होता है तो उसे किसी ऐसे अपने की ज़रूरत होती है जो उसकी आगे की ज़िन्दगी के लिए ईमानदारी से फैसले कर सके, उसे आगे की राह दिखा सके और वो उसपर विश्वास कर सके!
इसके बाद बस वह जवानी के चंद साल होते हैं जब इंसान अपने आप को कोई बड़ी चीज़ समझ लेता है!
लेकिन जैसे ही बुढ़ापा आने लगता है फिर उसे एक परिवार के सहारे की उसकी सेवाओं की ज़रूरत होती है! यह वह चंद बुन्यादी ज़रूरतें हैं जिन के लिए एक परिवार का होना इंसान के लिए बहुत ज़रूरी है या यूँ कहें कि एक परिवार के बिना यह ज़रूरते पूरी होना मुमकिन नहीं!
अगर यह ज़रूरतें नहीं हैं तो किसी परिवार को वजूद में लाने की भी कोई ज़रूरत नहीं है लेकिन अगर यह ज़रूरते इंसान के साथ लगी हुई हैं तो इनके लिए एक परिवार की भी ज़रूरत है!
यही वजह है कि इस्लाम में परिवार को बहुत अह्मयत हासिल है! इसलिए इस्लाम में घर-परिवार के तमाम ज़रूरी अहकाम अल्लाह ने खुद दिए हैं! 
एक परिवार एक पति पत्नी के पाकीज़ा और मुहब्बत से भरे हुए रिश्ते से वुजूद में आता है!
मर्द के लिए औरत का साथ और औरत के लिए मर्द के साथ की चाह... भूक और प्यास की तरह ही एक फ़ितरी चीज़ है। अल्लाह तआला ने इन्हें जिस तरह बनाया उस से इन में एक दूसरे के नज़दीक आने की शदीद ख्वाहिश होती है। पता नहीं यह मुझे कहना चाहिए या नहीं लेकिन यह ख्वाहिश ही एक परिवार को वजूद में लाने की पहली और मजबूत वजह बनती है अगर यह ख्वाहिश ना हो तो बहुत कम लोग होंगे जो शादी के लिए राज़ी होंगे या सही वक़्त पर शादी करेंगे!
......................
कुछ लोग सवाल करते हैं कि क्या वजह है इस्लाम में बिना शादी के हर तरह के सेक्स सम्बन्ध अपराध माने जाते हैं और उनके लिए सख्त सज़ा का प्रावधान
है और सेक्स को एक कारोबार के तौर पर मान्यता नहीं दी जाती ?
तो इसकी यही वजह कि इस्लाम पति पत्नी की एक दूसरे के लिए कीमत और अहमयत को किसी हाल भी कम नहीं करना चाहता! आप अंदाज़ा ही नहीं बल्कि आज खुद अपनी आँखों से पश्चिम की तरफ देख सकते हैं कि जिस समाज में शादी के बिना ही सेक्स को आसान और आम कर दिया जाए, जहाँ (एक सर्वे के मुताबिक) एक मर्द अपनी ज़िन्दगी में आठ अलग अलग औरतों के साथ सेक्स सम्बन्ध बना चुका हो, ऐसे समाज में किसको पत्नी की ख्वाहिश और किसको पति की चाह हो सकती है ?
आज़ादी के नाम पर बिना शादी के एक दूसरे के साथ रहने को क़ानूनी हक देना सोसाइटी, परिवार और खुद औरत के खिलाफ एक बहुत बड़ा जुर्म है! इसको किसी हाल में माफ़ नहीं किया जाना चाहिए! यह परिवार नामी संस्था के लिए बिलकुल ज़हर का काम करता है! वो परिवार जिस की वजह से माँ बाप अपने बच्चों की जुम्मेदारी और बच्चे अपने माँ बाप की जुम्मेदारी उठाते हैं, वो परिवार जहाँ रिश्ते बनते हैं और उनका एक मान होता है, वो परिवार जहाँ हमें हर तरह कि सिक्योरिटी ही नहीं बल्कि बे शुमार खुशियाँ भी मिलती हैं! अगर परिवार ना हो या एक सूत्र में बंधा ना हो तो मैं आप से सच कहता हूँ इंसान 90% खुशियों से महरूम हो जाता है!
अगर आप इन बातों से सहमत हैं और समझते हैं कि वाकई परिवार की हमें ज़रूरत है, तो ज़रूरी है कि शादी के बगैर हर तरह के सेक्स सम्बन्ध पर पूरी तरह रोक लगाई जाए! ताकि परिवार को वजूद में लाने और बरकरार रखने की यह सबसे बड़ी वजह इंसानों के बीच बाकि रहे!
इस वजह को बरक़रार रखने के मामले में इस्लाम बहुत संवेदनशील है! किसी हाल में भी वो यह बर्दाश्त नहीं करता कि बिना शादी के भी इस तरह के कोई सम्बन्ध रखें जाएं! कुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है- खबर दार ज़िना (व्यभिचार) के पास भी मत फटकना क्यों कि वह बड़ी बे हयाई है और बहुत ही बुरा रास्ता है (सूरेह बनी इस्राइल 32) याद रखये कुरआन ने यहाँ सिर्फ ज़िना करने ही से मना नहीं किया बल्कि उसके पास जाने को भी बहुत ही बुरा रास्ता बताया है! 
धर्म के नज़र्ये से सोचना शायद कुछ लोगों के लिए मुश्किल हो तो इंसानियत के नज़र्ये से ही गौर कीजये तो यह सेक्स आज़ादी सिर्फ परिवार की ही जड़ें कमज़ोर नहीं करती बल्कि खुद औरत पर यह अब तक का सबसे बड़ा ज़ुल्म है! कई सोसाइटी में मर्दों के लिए बीवी की कद्रो कीमत और ज़रूरत इस आज़ादी ने बिलकुल गिरादी है! जिसका नतीजा यह सामने आ रहा है कि मर्द शादी के बिना ही किसी औरत को दो चार साल अपने पास रखते हैं और फिर उससे अलग हो कर किसी दूसरी ''दोस्त'' को ले आते हैं! अगर इन सालों में वो कोई बच्चा पैदा कर लेते हैं और वो कुछ साल का हो जाता है तो अपनी माँ को किसी और घर में किसी और मर्द के साथ और अपने बाप को किसी और घर में किसी और औरत के साथ देख कर रिश्तों के बारे में जो तस्वीर उसके मन में बनती होगी उसका अंदाज़ा आप खुद कर सकते हैं!
आंकडें बताते हैं कि ऐसे समाज में हर दस शादियों में से 7 को तलाक हो जाती है, कम उम्र में बहुत सी लड़कियां बिना शादी के ही माँ बन जाती हैं, लड़कियों के रेप हो रहे हैं जो उनके ही कॉलेज के दोस्त कर रहे हैं, आपसी रिश्तों की कद्र इतनी ज़्यादा गिर गई है कि बहुत बड़ी तादाद में लड़कियों के साथ उनके ही बाप, भाई, कज़िन, चाचा, मामा, और सोतेले बाप की तरफ से रेप की कोशिश होती है! 
 इस तरह के समाज का अंत क्या है सिवाए इसके कि वहां बच्चे ''बेबी सेंटर'' में पलें और बूढ़े ''ओल्ड ऐज होम'' में अपनी मौत का इन्तिज़ार करें! और जवान मर्द और औरतें हर तरह के रिश्ते और परिवार की जुम्मेदारियों से आज़ाद नाईट कल्ब की रोनक बढ़ाएं, दोस्ती के नाम पर हर रात नय पाट्नर के साथ गुजारें और इस तरह जानवरों की सी ज़िन्दगी गुजारें! बल्कि हकीक़त तो यह है कि कुछ मोडर्न लोग एक थ्योरी पर अँधा ईमान ला कर खुद को जानवर से अलग समझने के लिए तैयार नहीं हैं! शायद यही वजह है कि वक़्त बे वक़्त कुछ लोग नंगे रहने का क़ानूनी हक मांगते रहते हैं, और जिस बेलगाम आज़ादी की बुन्याद पर आज का कानून खड़ा है उसे आज नहीं तो कल यह इजाज़त भी देनी ही पड़ेगी! ख़ैर....
इस समाज ने औरत को आज़ादी तो दी है लेकिन उसके बदले औरत से भारी कीमत वसूल की है! 
 इस तरह के समाज को अगर करीब से देखये तो वहां औरत आज़ाद नज़र ज़रूर आती है लेकिन उस पर ज़ुल्म की कोई इन्तिहा नहीं है! जब तक उस पर बुढ़ापे के आसार नज़र नहीं आते तब तक उसके खरीदार बहुत हैं लेकिन जैसे ही उसकी उमर ढलने लगती है उस के पास नौकरी कर अकेले रहने के सिवा कोई चारा नहीं रहता! और नौकरी में भी खूबसूरत औरत को वरीयता देने के साथ साथ यूरोप में ही मर्दों के मुकाबले औरतों को सैलरी 10 से 40% तक कम दी जाती है! इसकी वजह भी साइंटिफिक है.... कंपनियों को ज़्यादा काम करने वाले भाते हैं और मनोविज्ञान के विशेषज्ञ कहते हैं कि मर्द हार्ड वर्क करने और जल्दी काम करने की क्षमता ज़्यादा रखते हैं जबकि औरत को काम अहिस्ता लेकिन सलीके से करना पसंद है! यही नहीं वह कहते हैं कि कम्पनियों में अचानक बहुत ज़्यादा काम का बोझ पड़ने पर औरतें मर्दों के मुकाबले ज़्यादा बोझ और घबराहट महसूस करती हैं!
एक ज़ुल्म कंपियों में नौकरी करने वाली औरतों पर और सामने आया है, एक रिपोर्ट के मुताबिक मर्दों के साथ काम करने वाली अक्सर औरतों को किसी सहकर्मी या बॉस की तरफ से यौन उत्पीड़न की कोशिशों का सामना करना पड़ा है! और कुछ भी नहीं तो सहकर्मी मर्दों की तरफ से उन्हें ऐसे कमेन्ट सुनने को तो मिल ही जाते हैं जिससे उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है!
ज़ुल्म का कोई एक तरीका नहीं जो आज औरतों पर कथा कथिक मोडर्न सोसाइटी में हो रहा! आज माहोल ऐसा बनाया जा रहा है कि औरत को भी मर्दों की तरह नौकरियां करना ज़रूरी समझा जाने लगा है! इससे औरत को इज्ज़त मिली है या नहीं यह तो मैं नहीं जानता लेकिन मर्दों को औरतों के खर्च की जुम्मेदारी से ज़रूर आज़ादी मिलने लगी है! और औरत को अपनी जिंदगी में एक औरत और एक मर्द दोनों का किरदार अदा करना पड़ रहा है!
ऐडवाटाइज़ की दुनिया में देख लीजये तो उन्होंने औरत को एक शोपीस बना कर रख छोड़ा है, दिन पर दिन मॉडल्स के कपड़े कम ही नहीं किये जा रहे बल्कि बाइक जैसी खालिस मरदाना चीज़ के ऐड में बाइक से ज़्यादा औरतों के जिस्म की नुमाइश और उन्हें अश्लील इशारे करते हुए दिखलाया जाता है!
पोर्न फिल्मों को मंज़ूरी देकर दुनिया ने औरत की ऐसी तौहीन की है कि आसमान के नीचे पहले कभी किसी की ऐसी तौहीन नहीं हुई! मैं यह बात इस हवाले से नहीं कह रहा कि इन्हें देख कर इंसान में यौन इच्छा जागती है, बल्कि मैं इस हवाले से कह रहा हूँ कि जो कुछ औरत को उस में बना कर पेश किया जा रहा है, औरत का जो रूप उस में दिखाया जा रहा है, हकीकत यह है कि मैं उसे शब्दों में भी बयान करने की ताकत नहीं रखता....! क्या औरत ऐसी होती है ? क्या इन्हें देखने वाली नसलें औरत को उस इज्ज़त की निगाह से देख पाएंगी जिसकी वो हक दार है ?
महिलाओं के हक़ के लिए काम करने वाली संस्थाऐं भी इस तरफ ध्यान नहीं देती बल्कि कई बार ऐसा भी होता है कि यह संस्थाएं औरतों का ऐसा माइंड सेट कर देती हैं जिससे कई औरतें मर्द को अपना जोड़ा नहीं बल्कि दुश्मन समझने लगती हैं!
पुराने ज़माने में भी अक्सर समाजों में औरत को कोई इज्ज़त की निगाह से नहीं देखा गया! आप को जानकर शायत हैरत होगी कि एक लम्बे अरसे तक फिलोसफर्स में यह बहस रही कि औरत इंसान है भी या नहीं! कुछ ने औरत को शैतान का एजेंट माना तो किसी ने औरत होना ही पिछले जन्म के पापों का नतीजा माना था! ईसाईयों में आज तक बहुत से लोगों का यह मानना है कि आदम अ. से गुनाह करवाने और उसके बदले मसीह अ. को सलीब चढ़वाने की जुम्मेदार औरत है!
...............
यह सब तो मैंने उस सवाल के जवाब में लिखा है जिस में पूछा जाता है कि आज़ाद सम्बन्ध की इस्लाम में इजाज़त क्यों नहीं है!
यह तो आज़ाद सम्बन्ध के नतीजे में आज के वैस्ट के हालात की तरफ मैंने कुछ इशारे किये हैं अब मैं कुछ इशारे इस तरफ भी करना चाहता हूँ जिससे मालूम होता कि हम भी वैस्ट की राह पर बिलकुल उसके पीछे ही चल रहे हैं!
बद किस्मती से परिवार की अहमयत को हमारे यहाँ भी कम करने में कोई कसर मीडिया ने छोड़ी नहीं है! आज वैस्ट के जैसा करने की तमन्ना में हम उसके हर तरीके को अपनाने में लगे हुए हैं बिना यह सोचे कि सही क्या है और गलत क्या है!
धर्म से पीछा छुड़ाने का फैशन अब हमारे यहाँ भी जड़े फैलाने लगा है, और उसके नतीजे भी सामने आने लगे हैं! इसका अंदाज़ा आप इस बात से कर सकते हैं कि अभी पिछले दिनों अखबारों में एक रिपोर्ट छपी जिस में बताया गया था कि एक धर्म नगरी में कैसे सेक्स सामग्री की बिक्री 3 साल में दोगुनी से ज़्यादा हो गई है! इस खबर में खास बात यह थी कि लिखने वाले का अंदाज़ ऐसा था कि पढने वाले को अहसास हो कि यह कोई बुरी बात नहीं बल्कि अच्छे संकेत हैं और इस पर अफ़सोस नहीं बल्कि फख्र करना चाहिए! देखए अखबार कैसे लिखता हैं - 
(रिपोर्ट के मुताबिक कंडोम की बिक्री में सालाना 30-35 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक अब युवा परंपरागत तरीकों में विश्वास नहीं रख वैज्ञानिक तरीकों को अपना रहे हैं। बढ़ी हुई कीमतों के बावजूद भी युवा कंडोम खरीदने से परहेज नहीं करते हैं। 
कंडोम और गर्भनिरोधक की बिक्री के पीछे जागरुकता को अहम वजह माना जा रहा है।
नासिक में गर्भनिरोधक और कंडोम की डिमांड को लेकर कॉलेज जाने वाले छात्रों की संख्या में जबर्दस्त बढ़ोत्तरी हो रही है। कंडोम और गर्भनिरोधक की डिमांड लेकर आने वाले ज्यादातर युवाओं की उम्र 20 से 25 के बीच ही होती है। वहीं इसके बढ़ते इस्तेमाल से यौन रोगों को कम करने में भी आसानी हुई है।)
अफ़सोस है कि लिखने वालों को बिलकुल अंदाज़ा ही नहीं है वो किस आने वाली कयामत की खबर फख्र से लिख रहे हैं! एक ऐसी क़यामत जिससे औरत बे कीमत हो जाएगी, जिससे रिश्ते ख़त्म हो जाएंगें, जिससे घर तबाह हो जाएंगें!
हमारा ऐसे ब्रेन वाश किया जा रहा है कि हमारे ज़हनों से भी घर और रिश्तों की कद्रो कीमत बिलकुल गिरती जा रही है!
इसका अंदाज़ा आप इस जैसे जुमले से कर सकते हैं जो आज हमारे देश की मीडिया में भी आम सुनने को मिल जाते हैं जैसे - ''औरत बच्चे पैदा करने की मशीन नहीं है''..... इस जुमले में ''माँ'' के रिश्ते की ऐसी तौहीन है कि माँ के लिए इससे बड़ी गाली का तसव्वुर नहीं किया जा सकता, लेकिन आधुनिकता का पर्दा हमारी आँखों पर ऐसा पड़ा कि अब हमें इस जैसे जुमलों में कोई बुराई नज़र नहीं आती!
दूसरा जुमला जो इससे भी ख़तरनाक है वो है -''औरत घर में कैद होने के लिए नहीं है''...... इस जुमले का मतलब यह है कि हमने यह मान लिया है कि घर एक कैद खाना है और वहां रहने वाले कैदी हैं! आप शायद यह कहें कि मैं जज़्बाती बातें करने लगा हूँ लेकिन ज़रा गौर कीजये तो घर कोई कैद खाना नहीं बल्कि इंसान की वो जन्नत है जिसको बनाने के लिए वो बचपन से कोशिशें शुरू करता है और पूरी उम्र किसी ना किसी रूप में उसी के लिए महनत करता रहता है! घर दुनिया की वो सबसे खूबसूरत जगह हैं जिससे इंसान कभी उकताता नहीं है. 
यह घर बनाने और इसे बचाने के लिए ज़रूरी है कि हम बिना शादी के किसी भी तरह के सेक्स सम्बन्ध पर रोक लगाएँ. हकीक़त यह है कि फ्री सेक्स समाज और खुद औरत के खिलाफ एक बहुत बड़ा जुर्म है.
......................
(औरत और मर्द में फर्क)
अब आते हैं इस तरफ कि इस्लाम औरत को कैसे देखता है? उस से क्या करवाना चाहता है और उसे क्या हक देता है!
सबसे पहले तो यह जान लीजये कि इंसान होने के नाते अल्लाह की निगाह में औरत और मर्द में कोई फर्क नहीं, दोनों पूरे इन्सान है! दोनों बराबर इज्ज़त और सम्मान के हक़दार हैं, दोनों एक ही जींस हैं! कुरआन में अल्लाह तआला फरमाते हैं - ...मैं तुम में से किसी के अमल (कर्म) को व्यर्थ नहीं जाने दूंगा, चाहे मर्द हो या औरत, तुम एक दूसरे में ही से तो हो...(आले इमरान 195)
अल्लाह की निगाह में पैदाइशी तौर पर कोई भी कम और ज़्यादा दर्जे का नहीं होता, सब इंसान बराबर इंसान होते हैं! अल्लाह की निगाह में इंसान सिर्फ और सिर्फ अपने कर्म से छोटा और बड़ा होता है! इस लिए मर्द बहतर है या औरत ज़्यादा बहतर यह बहस करना ही बेमानी है!
इस्लाम दीन-ऐ-फितरत है! इसका मतलब यह है कि जो इंसान की प्रकृति है इस्लाम उसे उसी पर कायम रखना चाहता है! मर्द और औरत बराबर ज़रूर हैं लेकिन बराबरी का मतलब एक जैसा होना नहीं है! 
शतरंज से लेकर कुश्ती तक आप किसी मुकाबले में औरत और मर्द को आमने सामने नहीं देखते..... क्यों ? इसकी वजह यही है कि वह एक जैसे नहीं हैं! मैं नहीं कह रहा कि यह मुकाबले अगर किये जाएं तो हर मुकाबले में मर्द जीतेगा....नहीं! बल्कि मैं कह रहा हूँ कि ऐसा अगर किया गया तो वो इन दोनों के साथ इन्साफ नहीं होगा! 
मर्द और औरत में बहुत से फितरी फर्क हैं, यह फर्क उनके जिस्म में भी है, यह फर्क उनके काम करने के अंदाज़ में भी है, यह फर्क उनके रवैयों में भी है, यह फर्क उनकी प्राथमिकताओं में भी होता है और यह फर्क उनकी फीलिंग्स में भी हैं! और यह फर्क ऐसे भी नहीं हैं जो कभी कभी दिखाई देते हों! नहीं....बल्कि यह फर्क आप हर घड़ी महसूस करते हैं, हर जगह देखत सकते हैं! यह वो फर्क हैं जिन्हें हर औरत और मर्द खूब अच्छी तरह जानते हैं, इन्हें समझने के लिए आप को कोई दार्शनिक बन्ने की ज़रूरत नहीं है! हर औरत जानती है कि वह औरत है और हर मर्द जानता है कि वो मर्द है! और मैं आप से सच कहता हूँ कि दोनों की भलाई और खुशियाँ भी इसी में छुपी हैं कि वो अपनी फितरत पर कायम रहें उसे बदलने की कोशिश ना करें!
अल्लाह तआला ने औरत और मर्द को जिस फितरत पर पैदा किया है गौर कीजये तो इस्लाम में अल्लाह ने ठीक उसी फितरत के मुताबिक औरत और मर्द को जुम्मेदारी और हक दिए हैं! 
इस्लाम औरत को आज़ादी के साथ साथ उसकी जान की, उसकी आबरू की और उसकी कद्र ओ कीमत की हिफाज़त को यकीनी बनाना चाहता है और उससे समाज में वो काम करवाना चाहता है जिनके बिना समाज को इंसानी बुनयादों पर कायम रखना ना मुमकिन है! मेरी इस लाइन को एक बार फिर दोहरा लीजये क्यों कि यह बहुत अहम बात है, मैंने कहा कि - इस्लाम औरत को आज़ादी के साथ साथ उसकी जान की, उसकी आबरू की और उसकी कद्र ओ कीमत की हिफाज़त को यकीनी बनाना चाहता है और उससे समाज में वो काम करवाना चाहता है जिनके बिना समाज को इंसानी बुनयादों पर कायम रखना ना मुमकिन है!
अगर आप औरत की सब जिस्मानी और रूहानी विशेषताओं और कमजोरियों को सामने रख कर सोचें तो एक मिनट आप को यह फैसला करने में नहीं लगेगी कि उस में घर-परिवार को चलाने और सवारने की सारी विशेषताएं मौजूद हैं! और घर से बाहर के काम करने के मामले में उस में कई कमजोरियां मौजूद हैं, खास कर तब जब बाहर मुकाबले पर मर्द मौजूद हों!
फिर ऐसे ही मर्द की सब जिस्मानी और रूहानी विशेषताओं को सामने रख कर सोचें तो आप पाएंगे कि उसमे घर से बाहर के काम करने की सारी विशेषताएं मौजूद हैं! और घर को चलाने और सवारने के मामले में उस में कई कमजोरियां मौजूद हैं! इसका मतलब यह है कि कुदरत ने इस जोड़े को अलग अलग काम लेने के लिए बनाया! एक का असल मैदान घर है और दूसरे का असल मैदान घर से बाहर है!
अब इस ''असल मैदान'' शब्द को एक मिसाल से समझ लीजये! जैसे हम कहते हैं कि एक आलिम (ज्ञानी) का असल मैदान उसकी लाइब्रेरी है तो इसका मतलब यह नहीं होता कि उसे लाइब्रेरी से कभी निकलना ही नहीं चाहिए बल्कि इसका मतलब यह है कि उसकी मैन जुम्मेदारी लाइब्रेरी में पढ़ने लिखने की है! इसी तरह जब मैंने लिखा कि मर्द का असल मैदान कारोबार है तो इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि मर्द को घर में आना ही नहीं चाहिए या घर की कोई जुम्मेदारी उस पर है ही नहीं! अब जैसे आप समझ सकते हैं कि अगर एक आलिम लाइब्रेरी कि जुम्मेदारी सही से ना उठाए तो लाइब्रेरी का बर्बाद होना तो तय है ही साथ ही आलिम भी आलिम कहलाने के लायक नहीं रहेगा, जैसे एक आदमी कारोबार को वक़्त ना दे तो कारोबार तो तबाह हो ही जाएगा साथ में वो आदमी भी मुश्किल में आजाएगा, ऐसे ही औरत अगर घर की जुम्मेदारी ना संभाले तो घर का बर्बाद होना तो लाजिम है ही साथ ही औरत के लिए भी यह नुक्सान दायक है!
घर को कोई मामूली चीज़ समझने की भूल ना कीजयेगा, घर इंसान के लिए और इंसानी समाज के लिए बहुत ज़रूरी चीज़ है! इंसानी समाज बन ही नहीं सकता था अगर पति पत्नी मिल कर घर ना बनाते! घर की बर्बादी पूरे इंसानी समाज और इंसानी रिश्तों की बर्बादी है! घर एक आज़ाद औरत और आज़ाद मर्द के मिलन से नहीं बनता...नहीं हरगिज़ नहीं बनता, बल्कि यह सिर्फ एक पति और पत्नी के रिश्ते में बंध कर उसकी जुम्मेदारी संभालने से बनता है!
इस घर को बनाने, इसे कायम रखने, इसे चलाने और आगे बढ़ाने के लिए जो भी योग्यताएं चाहियें कुदरत ने वो सब औरत के अन्दर रखी हैं! मर्द इस मामले में औरत के मुकाबले में बहुत कमज़ोर साबित हुआ है! अल्लाह ने औरत को सिर्फ बच्चा पैदा करने की क्षमता ही नहीं दी बल्कि उसे इंसान बनाने की योग्यता भी सिर्फ 
माँ के पास है! जैसे आप जानते हैं कि एक बच्चे के लिए माँ का दूध दुनियां की सबसे बहतरीन खुराक है, ऐसे ही एक बच्चे के लिए माँ दुनियां ही सबसे बहतरीन टीचर है जिसका असर वो सबसे ज़्यादा क़ुबूल करता है! अगर औरतें घर की जुम्मेदारी ना निभा कर के कारोबार की जुम्मेदारी उठाएंगी तो यकीन जानिए मर्द और औरत दोनों बे घर हो जाएंगे! और इसमें औरत का नुकसान मर्द से कही ज़्यादा है, इसका अंदाज़ा आप को उन बातों से हो गया होगा जो मैं शुरू में पश्चिम समाज के हवाले से लिख आया हूँ! एक अच्छा समाज कहलाने का हक़दार वो समाज नहीं जहाँ आधी नौकरियों पर औरतों को रखा जाता हो बल्कि एक अच्छा समाज वो है जहाँ औरतों को नौकरी करने की ज़रूरत ही ना पड़े. 

Popular posts from this blog

बॉलीवुड मॉडल पार्वती माहिया ने क्यों कबूल किया इस्लाम। पढ़िए और शेयर कीजिये।

रोहिंगय मुसलमानो की मदद के लिए तुर्क़ी ने किया बर्मा पर हमला। पढ़े पूरी खबर

बड़ी खबर: योगी ने लगाई उत्तर प्रदेश में इन जानवर की कुरबानी पर रोक। पढ़े पूरी खबर।

मौलाना मदनी ने दी योगी को चेतावनी कुरबानी में रुकावट बनने की कोशिश मत कर। पढ़े पूरा ब्यान

कट्टर संगठन तालिबान व अलक़ायदा बर्मा पर हमला करने को तैयार। पढ़े पूरी खबर

अलका ने कहा छेड़छाड़ करने वालो का लिंग काटो तो शाज़िया उतरी लिंग के बचाव में। पढ़े पूरी खबर

मोदी के प्रधानमंत्री बनने से हो रहा है मुसलमानों का कत्ले आम-- अमेरिका। पढ़े पूरी खबर

हिन्दू संगठनों ने पोस्टर लगाकर दी मुसलमानों को बकरा ईद ना मनाने की धमकी। अगर मनाई तो पढ़े पूरी खबर

मुस्लिम लड़की को हिन्दू बनाने वाले हिन्दू युवक ने अब खुद कबूल किया इस्लाम। जानिए क्यों। शेयर करे