औरत और इस्लाम 3

{{{ औरत और इस्लाम }}}
भाग - 3
अब मैं कुछ सवाल और उनके जवाब लिखने की कोशिश करूँगा जो एतराज़ के तौर पर इस्लाम पर औरत के हवाले से किये जाते हैं. 
सबसे पहला सवाल है कि- 
कुरआन ने शोहर को बीवी के साथ मार पिटाई करने का हक देकर मर्दों को अपनी बीवियों पर ज़ुल्म करने की खुली छूट क्यों दी है ?
यह भी एक गलत फहमी है जो कुरआन की उस आयात को गलत तरीके से पेश करने की वजह से पैदा हुई है! असल बात यूँ नहीं कि शोहर जब चाहे किसी भी बात पर बीवी को मार सकता है बल्कि कुरआन में यह पूरी बात देखें तो वहां मामला ही कुछ और है!
यह कुरआन की सूरेह निसा की 34 नं आयात है! इसमें पूरी बात यह लिखी है कि अगर तुम बीवी में सरकशी देखो यानि अगर बीवी बेवफ़ाई पर उतर आए या बगावत करे या अपनी कोई जुम्मादी जो इस्लाम ने उसपर बीवी की हेस्यत से डाली है निभाने से इनकार करे! यानि तलाक भी ना मांग रही हो और बीवी की तरह भी रहने के लिए तैयार ना हो जिसके नतीजे में घर का निज़ाम ना चल सकता हो तो कुरआन ने शोहर को मशवरा दिया कि उन्हें सीधे तलाक ना दो बल्कि घर बचाने की कोशिश इस तरह करो कि पहले उसे समझाओ! ज़ाहिर है समझाने के भी कई तरीके होते हैं पहले शोहर खुद समझाएगा उससे बात ना बनी तो अपने बड़ों को, अपने घर के शुभचिंतकों को और बीवी के घर वालों को साथ में ला कर भी समझाने की कोशिश करेगा!
इसके बाद भी अगर समझाने में कामयाबी नहीं मिली तो कुरआन ने कहा है कि बीवी से अपना बिस्तर अलग कर दो! यानि बहुत ज़्यादा नाराज़गी का इज़हार करो शायद इस से वो बाज़ आजाए! इसके बाद भी अगर बात नहीं बनी तो उसे सही रास्ते पर लाने के लिए हलकी मार मार सकते हो! जिसे हज़रत मुहम्मद (स) ने फ़रमाया कि इतना ज़ोर से ना मारो कि निशान वगैरा हो जाए (सही मुस्लिम 2950) और मूह पर मारने से भी आप ने माना फ़रमाया!
यह शोहर के हक की आखरी हद है इससे आगे उसे कोई कदम उठाने का हक नहीं, फिर बस तलाक ही आखरी रास्ता है! लेकिन अगर इससे बात बन जाए तो इसी आयत में आगे अल्लाह ने फ़रमाया है कि फिर बीवी को बिलकुल माफ़ कर दो और उससे बदला लेने के बहाने तलाश ना करो! आखिर अल्लाह तो सबके सब गुनाह जानता है और सबसे बड़ा है फिर भी वो बन्दे की तौबा के बाद उसके गुनाह बिलकुल माफ़ कर देता है!
याद रखये यह हक भी सिर्फ एक कंडीशन में दिया गया है जब शोहर तलाक देने से बचना चाहता हो और कोशिश करना चाहता हो कि किसी तरह मेरा परिवार बच जाए! बीवी से बदला लेने के लिए या उसे सज़ा देने के लिए यह नियम बिलकुल नहीं है! और ध्यान रहे इस हाथ उठाने का मतलब भी ज़ुल्म करना नहीं है अगर शोहर ने ऐसे मारा जिसे ज़ुल्म कहते हैं तो फिर वो क़ानूनी सज़ा का हक दार हो जाएगा! 
इस पर सवाल किया जा सकता है कि अगर शोहर अपने फ़र्ज़ ना निभा रहा हो तो क्या बीवी को भी उसे सीधे रास्ते पर लाने के लिए ऐसे ही सब शोहर के साथ करने का हक है ?
तो जी हाँ बीवी उसे समझाएगी, बड़ों को भी बीच में लाएगी, नाराज़गी का इज़हार भी हर तरह से करेगी लेकिन वो शोहर को मार नहीं सकती! और मार इसलिए नहीं सकती क्यों कि वो रिश्ते में बीवी से बड़ा है! जैसे बाप का रिश्ता बेटे से बड़ा होता है इसी लिए बाप हज़ार गलती करे लेकिन बेटे को उस पर हाथ उठाने का हक नहीं है, बाकि वो बाप को सही राह पर लाने के सब तरीके आज़माए गा! लेकिन अगर उसने हाथ उठा दिया तो यह उसके रिश्ते की तौहीन होगी इसी तरह अगर बीवी को भी हाथ उठाने का हक दिया जाए तो फिर शोहर का रिश्ता बड़ा कहाँ रहा ?
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कुरआन में अल्लाह ने मर्द को चार बीवी रखने की इजाज़त दे कर औरत पर ज़ुल्म किया है ?
यह भी एक अधूरी बात बयान की जाती है जिससे कई गलत फहमियां पैदा हो गई हैं! आप शायद ना जानते ही लेकिन कुरआन से पहले तो लोग चार से भी ज़्यादा बीवी रख सकते थे, और यह सिर्फ मुसलमानों के लिए ही खास नहीं था बल्कि सभी धर्मों के लोग पुराने ज़माने में कई कई शादियाँ कर लेते थे! इस पर कभी पाबन्दी नहीं लगाई जा सकती थी क्यों कि यह कई सामाजिक ज़रूरतों के तहत होते थे! पहले ज़मानों में ज़्यादा शादी करने की दो वजह सबसे बड़ी होती थी! एक तो राजा और कबीलों के सरदार दूसरे राजा और सरदारों के यहाँ रिश्ते करते थे ताकि उनसे जंग ना हो, यह शांति समझोते का एक तरीका था जो उस ज़माने में काफी कामयाब भी रहा है! दूसरी वजह थी लड़कियों और बेवाओं की संख्या लड़कों से ज़्यादा होना, और ज़्यादा होने की वजह यह थी कि जंगों में हर रोज़ सिपाही मरते थे जिन में कुवारें मर्द भी होते थे और शादी शुदा भी! इसलिए मर्दों को ज़्यादा शादी करनी ही पड़ती थी वरना बहुत सी लड़कियों को पूरी उम्र बिना शादी के ही रहना पड़ता! इसलिए अपनी माली हेस्यत के मुताबिक (अनुसार) जो ज़्यादा खर्च उठाने के काबिल होता था वो इतनी ही ज़्यादा शादियाँ कर लेता था! 
 कुरआन ने तो फिर भी चार तक की कैद लगा दी है और कुरआन ने भी यह इजाज़त किसी को ऐश और मस्ती करने को नहीं दी है बल्कि जहाँ कुरआन में इसका ज़िक्र है यानि सूरेह निसा आयात 3 मैं वहां पूरी बात यह है कि एक जंग के बाद बड़ी तादाद में औरतें विधवा हो गई थीं जिनके साथ बच्चे भी यतीम हो गए थे! तो कुरआन ने ऐसे हालात में कहा कि मुसलमान उन यतीम बच्चों की जुम्मेदारी संभालें! और अगर किसी को यह अंदेशा हो कि वो अहसान के तौर पर यतीम बच्चों का ऐसे ख्याल नहीं रख सकेगा जैसा रखना चाहिए तो उन बच्चों की माओं से एक से चार तक यानि जितनों का तुम खर्च उठा सकते हो शादी कर के उन्हें अपनी बीवी और उनके बच्चों को अपने बच्चे बनालो! फिर आगे यह भी फ़रमाया कि इसमें अगर तुम्हे यह अंदेशा हो कि तुम अपनी बीवियों को बराबर हक नहीं दे पाओगे तो फिर एक ही बीवी रहने दो! दो बीवियों के बीच बराबरी का हक देना शोहर के लिए ज़रूरी किया गया है! यह बहुत मुश्किल काम है कि कोई अपनी दो बीवियों को एक जैसे घर, एक जैसा खाना, कपड़ा और उनको बराबर टाइम दे सके! लेकिन यह ज़रूरी है अगर वो ऐसा नहीं कर सकता तो कुरआन के मुताबिक फिर उसे दूसरी शादी ज़रूरत पड़ने के बाद भी नहीं करनी चाहिए!
देखये मर्द के लिए एक ही बीवी का होना फितरी चीज़ है, यही वजह थी कि अल्लाह ने जब आदम (अ) को बनाया तो उन के लिए एक ही बीवी (हव्वा अ.) बनाई गई! यह बात सभी जानते हैं कि एक ही बीवी हो तो परिवार ज़्यादा सही से चल सकता है! लेकिन यह भी सही है कि समाज में अगर लड़कियां या विधवाएं ज़्यादा हो जाएं तो फिर ज़रूरी है कि मर्द जो कर सकता है वो एक से ज़्यादा शादी करे!
हमारे कुछ भाई अक्सर प्रचार करते हुए मिल जाते हैं कि सब मुलसमान चार-चार बीवी रखते हैं! सही बात है कि गुस्से की तरह नफरत भी इंसान की अकल को खा जाती है तभी तो ऐसे लोग दिमाग पर थोड़ा सा ज़ोर देकर ये भी नहीं सोचते कि दो शादी के लिए दो और चार शादी करने के लिए चार औरतें भी चाहियें! अब अगर मुसलमानों में औरतें ज़्यादा हैं तो उन्हें ज़्यादा शादी करनी ही चाहिए और अगर औरतें ज़्यादा नहीं है तो सब मर्द ज़्यादा शादी कैसे कर सकते हैं ? 
इसी से रिलेटिड एक सवाल यह भी किया जाता है कि जब मर्द चार बीवी रख सकता है तो औरत चार शोहर क्यों नहीं रख सकती ?
मैंने इससे पहले इस्लाम में परिवार का जो तसव्वुर लिखा है उसे समझने के बाद यह बात समझना बहुत आसान हो जाता है कि क्यों औरत एक से ज़्यादा शोहर नहीं रख सकती! यह तो मुमकिन है कि एक मर्द एक से ज़्यादा परिवारों का ख्याल रख सके लेकिन औरत के लिए यह मुमकिन नहीं कि वो एक साथ एक से ज़्यादा परिवार और शोहर की ताबेदारी कर सके. जब परिवार का मुखिया शौहर को बनाया गया है तो एक परिवार के दो मुखिया होना मुमकिन नहीं इस लिए एक बीवी दो शौहर की जुम्मेदारी नहीं उठा सकती.
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औरत को जायदाद में मर्द से आधा हिस्सा दे कर इस्लाम ने औरत के साथ यह ना इंसाफी क्यों की ?
यह एतराज़ करने वाले लोग शायद नहीं जानते कि इस्लाम ने उस ज़माने में लड़की को जायदाद में हिस्से दार बनाया जिस में पूरी दुनिया में कहीं भी लड़की को जायदाद में हिस्सा देने का कानून नहीं था! इस्लाम बड़ा मज़लूम मज़हब है लोग इसका एहसान मानने के बजाए इसी पर उंगली उठा देते हैं! ख़ैर...
याद रखये कि इस्लाम में औरत का हिस्सा आधा नहीं है बल्कि पूरा है! लेकिन मैं बात फिर वही कहूँगा कि लोग रिश्तों की बहस को मर्द और औरत की बहस बना कर पेश करते हैं जबकि यह दो अलग अलग चीज़ें हैं! अगर जायदाद में औरत का हिस्सा मर्द से आधा ही होता तो कुरआन माँ और बाप का हिस्सा बराबर ना रखता (सूरेह निसा 11) और ऐसे ही मरने वाले के भाई और बहन का हिस्सा भी बराबर रखा गया है (सूरेह निसा 12) हालाँकि माँ और बहन औरत हैं और बाप और भाई मर्द हैं! इससे साफ़ पता चलता है कि विरासत में हिस्से में फर्क की बुन्याद लिंग भेद तो नहीं है! तो वो आधा हिस्सा बेटा और बेटी के रिश्ते में है ना कि औरत और मर्द में!
बेटा और बेटी को विरासत के हिस्से में फर्क भी इन्साफ पर मबनी है, इसकी वजह यह है कि माँ बाप कानूनन बेटे की जुम्मेदारी हैं ना कि बेटी की! बेटी तो शादी के बाद दूसरे घर चली जाती है माँ बाप का ख्याल रखना उनकी ज़रूरतें पूरी करना यह बेटे की जुम्मेदारी है अगर बेटा यह जुम्मेदारी नहीं निभाता तो उस पर क़ानूनी कारवाही करने का पूरा हक अदालत को है! और यह बात मैं बार बार कह रहा हूँ कि जिस को जितनी बड़ी जुम्मीदारी देनी होती है उसे हक भी इतने ही ज्यादा देने पड़ते हैं यही इन्साफ का तकाज़ा है! इसी लिए बेटे का हिस्सा बेटी दे दोगुना रखा गया है!
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इस्लाम में हलाला निकाह का क्या मतलब है ?
शब्द निकाह इस्लाम में एक इस्तिलाह (The term) है जो उस शादी नामी कोंट्रेक्ट के लिए बोला जाता है जिस के नतीजे में एक मर्द और एक औरत का आपस में जिस्मानी सम्बन्ध बनाना कानूनन शरअन जायज़ हो जाता है. निकाह के लिए ज़रूरी शर्त यह है कि दोनों (पति पत्नी) का इरादा ज़िन्दगी भर साथ रहने का हो, तभी शर्यत में उसे निकाह माना जाएगा वरना नहीं. और इस्लाम में बिना निकाह के हर तरह के जिस्मानी सम्बन्ध बिलकुल हराम हैं. 
अगर कोई चीज़ निकाह के नाम पर या निकाह के जैसे की गई है लेकिन उस में मर्द या औरत का इरादा ज़िन्दगी भर साथ रहने का नहीं बल्कि कुछ समय साथ रहने का इरादा है तो यह निकाह नहीं बल्कि एक साजिश है जो एक मर्द और एक औरत ने आपस में जिस्मानी सम्बन्ध बनाने के लिए की है.
आप ने ''तलाक और इस्लाम'' नामी मेरी पोस्ट में पढ़ा होगा कि एक मर्द अगर एक ही औरत से तीन बार तलाक हो जाने के बाद भी चौथी बार निकाह करना चाहे तो इस्लाम में 3 शर्तों के साथ इसका सिर्फ एक रास्ता है. वो तीन शर्तें यह हैं.
1 तीसरी तलाक के बाद वो औरत किसी दूसरे मर्द से निकाह करे (ध्यान रहे मैंने निकाह कहा है)
2 दूसरे मर्द से भी इत्तिफाक से उसका निबाह ना हो पाए जिससे उन में तलाक हो जाए या दूसरा शोहर मर जाए.
3 और तीसरी यह कि दोनों इरादा करें कि अब फिरसे निकाह के बाद वो दोनों अल्लाह की कायम की हुई हदों का ख्याल रखेंगे. यानि आइन्दा एक दूसरे के वो हक जो अल्लाह ने शौहर बीवी पर एक दूसरे के लिए रखें हैं उन्हें पूरी ईमानदारी से अदा करेंगे. 
इन तीनों शर्तों पर अगर कोई उतरता है तो ही उनका चौथी बार निकाह हो साकता है.
यह तो इस्लाम में निकाह और तलाक का कानून है जो अपनी जगह बिलकुल सही है अगर इस पर ठीक ऐसे ही अमल किया जाए जैसा कि यह है तो ना किसी मर्द को कोई मुश्किल होगी और ना किसी औरत को, लेकिन कई लोग जिहालत में तलाक के हक से तो फायदा उठा लेते हैं लेकिन उसे ऐसे इस्तिमाल नहीं करते जैसे शर्यत में हुकुम है. 
वह करते यह हैं कि शर्यत में जिस तरह तलाक देने की इजाज़त है जिसे मैंने ''तलाक और इस्लाम'' पोस्ट में भी लिखा है वो लोग शर्यत में तलाक की सारी शर्तों पर खरा उतरे बगैर और शर्यत ने जो ज़िन्दगी में तीन बार तलाक का हक दिया था जाहिल होने की वजह से उन्हें एक ही साथ इस्तिमाल कर लेते हैं यानि जाने क्यों तीन तलाकें एक साथ ही दे देते हैं.
उसके बाद जब पछतावा होता है और वापस उसी बीवी को लाना चाहते हैं तो तीन तलाक के बाद जो 3 शर्तें चौथी बार निकाह करने की शर्यत में हैं उन्हें भी पूरा नहीं करते और शर्यत के साथ एक साजिश करते हैं जिसे आज हलाला कहा जाता है.
हलाला यानि पहले शौहर से फिर से निकाह करने के लिए बीवी किसी दूसरे मर्द से निकाह करती है जिस में मर्द से पहले ही यह बात ज़ुबानी तय हो जाती है कि वो उसे सुहागरात के अगले दिन तलाक दे देगा. यानि शर्यत को धोका देने के लिए एक साजिश को निकाह का रूप देने की कोशिश की जाती है. यह सरासर हराम है और इस्लाम में ऐसा कोई तरीका सिरे से मौजूद ही नहीं है. और जैसा कि मैंने ऊपर लिखा कि निकाह किसी थोड़े समय के लिए एक दूसरे के साथ रहने को नहीं कहा जाता उसके लिए ज़िन्दगी भर का इरादा ज़रूरी है वरना वो निकाह है ही नहीं. जब निकाह ऐसे हो ही नहीं सकता तो ज़ाहिर है चौथी बार किसी से निकाह करने की शर्त जो कुरआन ने लगाई है वो इरादे के साथ पूरी नहीं की जासकती वो सिर्फ इत्तिफाक से पूरी हो सकती है.
इरादे से किये हुए किसी हलाले का इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं वो सिर्फ एक ज़िना (व्यभिचार) है इस लिए इस हलाले के बाद भी पहले शौहर से फिर से उसका निकाह जायज़ नहीं होता.

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