औरत और इस्लाम 2

{{{ औरत और इस्लाम }}}
भाग - 2
(निकाह)
इस्लाम में शादी से पहले लड़की बाप और भाई की जुम्मेदारी है! ज़ाहिर है मुझे यह कहने की ज़रूरत नहीं कि लड़कों की तरह उसे भी शिक्षा लेने का हक़ भी है और ज़रूरत भी!
उसका पूरा हक है कि वो इस काबिल बने कि ज़रूरत पड़ने पर कहीं अच्छी नौकरी या बिज़निस करने के काबिल हो सके! हाँ यह ज़रूर है कि बड़े लड़के लड़कियों का स्कूल कॉलेज अलग अलग होना चाहिए इसी में दोनों की भलाई है! क्यों अलग होने चाहियें ? तो पहली पोस्ट में जो कुछ मैं लिख आया हूँ उसके बाद मुझे नहीं लगता किसी समझदार इंसान को यह बात समझने में कोई भी दिक्कत होगी कि लड़के लड़कियों के कॉलेज अलग क्यों होने चाहियें!
शादी के मामले में भी लड़के की तरह लकड़ी को पूरा हक है कि वो फैसला करे कि उसे किस से शादी करनी है और किस से नहीं करनी! दूसरा हक़ उसका यह है कि वो फैसला करे कि उसको कितना महर लेना है या अगर शादी के बाद की ज़िन्दगी के लिए उसकी कुछ शर्ते हैं तो किन शर्तों पर वो इस शादी के लिए तैयार है!
(नोट - महर के बारे में कुछ इस्लाम दुश्मन लोगों ने यह गलत फहमी भी फैलाने की कोशिश की है कि महर का मतलब लड़की की कीमत होता है. यह सरासर एक झूट बात है हकीक़त यह है कि इस्लाम में महर उस जुम्मेदारी का प्रतीक है जो इस्लाम शौहर के ऊपर डालता है कि वो बीवी के सब खर्च उठाएगा. यह उसकी जुम्मेदारी है कि वो अपने परिवार का खर्च पूरा करने के लिए महनत करे. महर सिर्फ इसी जुम्मेदारी को उठाने की पहली किश्त है. जब कोई मर्द महर अदा कर रहा होता है तो असल में वो इसका इज़हार कर रहा होता है कि वो बीवी की आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करेगा.
यहाँ यह भी ध्यान रहे कि महर की रकम कितनी होगी यह इस्लाम ने तय नहीं किया है बल्कि इसको समाज पर छोड़ दिया है. लड़की के स्टेंडर्ड और लड़के की हेस्यत को ध्यान में रख कर यह रकम बहुत कम या बहुत ज़्यादा भी हो सकती है.) 
 महर की रकम तय करना भी लड़की का हक है ताकि अगर वो ज़रुरत समझे तो इस रक़म को कभी किसी अपने मुश्किल वक़्त में काम में ला सके! कुरआन में इसको बड़ी अहमयत दी गई है कम से कम दस आयातों में महर का ज़िक्र है!
महर के फलसफे को समझते ही यह बात समझने में भी कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि जहेज़ की इस्लाम में कोई गुंजाइश नहीं निकलती, क्यों कि लड़की की सब ज़रूरतों को जुम्मेदार जब इस्लाम ने लड़के को बनाया है तो ज़ाहिर है कि यह जुम्मेदारी भी लड़के पर ही है कि वो आने वाली दुल्हन की ज़रूरत का हर सामान उसके आने से पहले ही खुद घर में ला कर रखे. अगर वो ऐसा नहीं करता और जहेज़ की शक्ल में बीवी अपनी ज़रूरतों का सामान खुद लाती है तो इसका मतलब यह है कि जो जुम्मेदारी इस्लाम ने शौहर के ऊपर डाली थी उसने उस जुम्मेदारी को सही से नहीं निभाया है. 
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एक ज़रूरी शर्त निकाह के लिए लड़का लड़की दोनों पर लागु होती है वो यह है कि उन दोनों का दामन पाक हो! ऐसा नहीं होना चाहिए कि एक तो पाक दामन हो और दूसरा पहले ही कहीं मूह काला कर चुका हो! इस्लाम में इस तरह के निकाह को हराम करार दिया गया है! (सूरेह निसा 24 और सूरेह नूर 3)
निकाह जैसे पाकीज़ा रिश्ते को कायम करने और रखने के लिए इस्लाम की नज़र में दोनों का पाक दामन होना और आगे भी सारी उम्र पाक दामन रहना बहुत ज़रूरी है! इस से आप को अंदाज़ा हो सकता है कि इस्लाम शोहर और बीवी के रिश्ते को किस कदर पाकीज़ा बुन्यादों पर खड़ा करना चाहता है!
वो किसी बदकिरदार को यह हक नहीं देता कि वो किसी पाक दामन मासूम से निकाह करे इस्लाम की निगाह में वो उसके लायक ही नहीं है!
हाँ अगर किसी से गलती हो ही गई और मामला अभी लोगों से परदे में है तो उसका एलान करने की ज़रूरत नहीं लेकिन निकाह से पहले उसे पक्की सच्ची तौबा करनी होगी और अल्लाह से यह वादा करना होगा कि आने वाली जिंदगी में वो हमेशा पाक दामन रहेगा! अगर ऐसे तौबा करेगा या करेगी तो ही उसका निकाह जायज़ होगा!
अगर कोई ऐसे तौबा नहीं करता और दुनिया कि नज़र में धूल झोंक कर किसी पाकदामन से निकाह भी कर लेता है तो उसे नहीं भूलना चाहिए कि वो लोगों से तो छुप सकता है लेकिन अल्लाह से छुप नहीं सकता! क़यामत में बहरहाल उसका पर्दा फाश होना ही है उस वक़्त जिस से उसने शादी की थी उस से धोके की कीमत उसे चुकानी ही होगी! 
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(शौहर और बीवी) 
इसके बाद लड़का लड़की का निकाह हो जाता है जिससे वो एक रिश्ते में बंध जाते हैं. याद रखये इस्लाम में निकाह का मतलब सिर्फ जिस्मानी सम्बन्ध को जायज़ बनाना ही नहीं बल्कि निकाह एक मर्द और एक औरत के बीच एक अनुबंध (Contract) भी होता है! इसमें कुछ शर्तें कुछ जुम्मेदारी क़ानूनी तौर पर एक दूसरे पर डाली जाती हैं! 
यहाँ ज़रा रुक कर एक बात समझ लीजये कि दुनिया में कोई भी रिश्ता हो उसमे आपस में दर्जे होते हैं और यह होने भी चाहियें! बाप का दर्जा बेटे से कहीं ज़्यादा है हालाँकि वे दोनों पूरे इंसान है और इंसान होने के नाते उनमे कोई फर्क नहीं है! लेकिन जब बात रिश्ते की आती है तो यह मुमकिन नहीं कि आप बाप बेटे को बराबर करदें, अगर आप ऐसा करेंगे तो वो रिश्ते ही कायम नहीं रह सकेंगे! एक बाप को हक़ है कि बेटा अगर गलत रास्ते पर चल पड़ा है तो वो उसे गिरेबान पकड़ कर सीधा करदे, लेकिन अगर बाप गलत रास्ते पर चल पड़ा है तो बेटे को हक नहीं कि वो उस पर हाथ उठा सके! यही रिश्तों के बीच का फर्क होता है इसे आप मिटा नहीं सकते अगर मिटाने की कोशिश करेंगे तो रिश्ता ही मिट जाएगा! अगर मेरी बड़ी बहन या भाई मुझ से दो चार साल बड़ा है तो इसमें उसका कोई कमाल नहीं है और ना यह मेरी गलती है कि मैं छोटा हूँ लेकिन फिर भी बड़ा होने के नाते उसको हक है कि वो मुझे डांटदे ज़रूरत पर वो मेरे कान के नीचे एक आध लगा भी सकता है लेकिन यह हक मुझे नहीं है, मैं सिर्फ उससे अपील कर सकता हूँ! क्या आप इसे ना इंसाफी कह सकते हैं ? नहीं यह ना इंसाफी नहीं बल्कि रिश्तों के दर्जे हैं! अगर उसे मुझ पर कुछ हक दिए गए हैं तो कुछ जुम्मेदारी भी उस पर मुझ से ज़्यादा हैं! उस जुम्मेदारी के तहत ही उसका फर्ज़ बनता है कि ज़रूरत पड़ने पर वो मेरी हिफाज़त के लिए आगे आए! मेरी तरफ बढ़ने वाली चोट को अपने ऊपर ले, मैं भूका हूँ तो मेरे लिए खाने पीने का इन्तिज़ाम अपने खाने से पहले करे!
दुनिया में सिर्फ एक रिश्ता होता है जिस में बराबर के हक और बराबर की जुम्मेदारी होती हैं और वो है दोस्ती का रिश्ता! बाकि सारे रिश्तों में दर्जे होते ही हैं!
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औरत के मामले में मौजूदा वैस्ट सोसाइटी और इस्लाम में जो बुनयादी फर्क है वो यह है कि वैस्ट में रिश्तों में फर्क और परिवार को कोई अहमयत हासिल नहीं! इसका अंदाज़ा आप इस कानून से कर सकते हैं कि वहां गलती पर माँ बाप को भी बच्चे पर हाथ उठाने का हक नहीं! 
जबकि इस्लाम का नज़र्या इससे बिलकुल अलग है, हमारे यहाँ माँ बाप तो क्या बड़ी बहन भी छोटे भाई पर हाथ उठा सकती है! देखए ज़ुल्म करना एक चीज़ है और अपने किसी छोटे पर उसे कुछ समझाने-सिखाने के लिए हाथ उठाना एक अलग चीज़ है!
इस्लाम रिश्तों और परिवार को बहुत अहमयत देता है! क्यों देता है इसके कुछ इशारे मैं पहले कर चुका हूँ.
जब एक लड़का और एक लड़की शादी कर लेते हैं तो उनके बीच एक रिश्ता बन जाता है! नोट कर लीजये अब यह हक की बहस मर्द और औरत की बहस से निकल कर पति और पत्नी के हक की बहस में बदल जाती है! अब सारे हक और जुम्मेदारियां मर्द और औरत की हेस्यत से नहीं बल्कि शोहर और बीवी की हेस्यत से बांटे जाएंगे!
एक जोड़े के पति और पत्नी बन जाते ही एक परिवार वजूद में आजाता है और एक परिवार के वजूद में आते ही सबसे पहला और बड़ा सवाल जो पैदा होता है वो यह है कि घर का खर्च कौन देगा ?
इस का जवाब यह है कि इस्लाम में बल्कि यह कहना चाहिए कि फितरत में भी पत्नी पर किसी भी खर्च की कोई जुम्मेदारी नहीं डाली गई है! अपने, अपनी बीवी के, अपने बच्चों के मकान से लेकर घर की सुईं तक सब खर्च पति की जुम्मेदारी है! इससे आप समझ सकते हैं कि यह एक बड़ी जुम्मेदारी है!
अब जब आप किसी को जितनी बड़ी जुम्मेदारी देते हैं उसको उतनी ही अथॉरिटी देनी पढ़ती है! इस्लाम ने पति पत्नी के बीच पति को एक दर्ज़ा ज़्यादा हक दिया है और उसकी वजह है उस पर जुम्मेदारी ज़्यादा होना! जैसे मैंने ऊपर छोटे और बड़े भाई बहन के बीच में हक का फर्क बताया है ठीक ऐसे ही पति पत्नी के रिश्ते में भी हक और जुम्मेदारी का फर्क है!
कुरआन ने इसे कुछ ऐसे बयान किया है- ....आम तौर पर बीवी के लिए भी वेसे ही हक़ हैं जैसे शोहर के लिए हक़ हैं और शोहर का एक दर्ज़ा ज़्यादा है.... (सूरेह बक्राह 228)
वो एक दर्जा यह है कि घर का प्रमुख पति है! एक परिवार एक छोटी सी रियासत की तरह होता है, जहाँ कुछ इंतेज़ाम करने होते हैं कुछ जुम्मेदारियां उठानी होती हैं कुछ फैसले लेने होते हैं! हर एक रियासत को एक प्रमुख की ज़रूरत ज़रूर होती है तो इस परिवार नामी रियासत को भी एक प्रमुख की ज़रूरत थी जो पति को बनाया गया है! और बनाया इसलिए गया है क्यों कि वो इसका हक़दार भी था और इसके लिए ज़्यादा लायक भी! हकदार इसलिए कहा क्यों कि घर उसका होगा, सारा खर्च उसका होगा, और हिफाज़त के लिए आगे आने की जुम्मेदारी भी उस पर है! और ज़्यादा लायक इसलिए कहा क्यों कि कुदरत ने उसे इसके ज़्यादा लायक किया है कि वो पैसे और हिफाज़त के लिए हर तरह की महनत कर सके! 
 इस पर किसी को यह एतराज़ हो सकता है कि कई जगह बीवियां भी तो कमा कर लाती हैं ? तो जी हाँ यह सच है कि ऐसा होता है लेकिन बात समझने की यह है कि वो अगर कमा कर लाती है घर में खर्च करती है तो यह उसका अहसान है ना कि जुम्मेदारी! यानि अगर पति बच्चों और पत्नी का खर्च नहीं दे रहा तो पत्नी चाहे तो उस पर क़ानूनी केस कर सकती है यह उसका हक है! लेकिन अगर पत्नी खर्च नहीं दे रही तो पति को उस पर कोई दबाव डालने का हक नहीं है! ऐसे ही अगर किसी मोके पर घर परिवार की कुछ हिफाज़त का मसला आया तो पत्नी को हक है कि वो पति से कहे कि जाओ जाकर लड़ो क्यों कि यह उसकी ड्यूटी है!
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एक एतराज़ इस पर यह भी किया जा सकता है कि क्यों ना पति पत्नी का रिश्ता दोस्तों की तरह माना जाऐ जिससे उन्हें एक दूसरे पर बराबर हक मिलें ? 
इसका जवाब यही है कि ऐसा तभी मुमकिन था जब जुम्मेदारी भी बराबर बांटी जाती! घर खरीदने के लिए आधे पैसे पति देता और आधे पत्नी, बच्चों के हर खर्च में आधे पैसे पति को देने होते और आधे पत्नी को! इसके बाद भी एक बड़ा मसला यह रहता कि जिन मामलों में परिवार की इस रियासत को प्रमुख की ज़रूरत होती है वो सारे मामले झगड़े खड़े कर देते क्यों कि किसी एक को फैसला करने का हक नहीं दिया जा सकता था! आप यह नहीं कह सकते कि हमें किसी प्रमुख कि ज़रूरत नहीं है अगर ऐसा होता तो हम अपने ऊपर ना किसी को कभी मुख्य मंत्री बनाते और प्रधान मंत्री बनाते और ना राष्ट्र पति! हमें हर छोटे बड़े निज़ाम को सही से कायम रखने के लिए किसी को प्रमुख बनाना ही पड़ता है इसके बिना कोई निज़ाम चल नहीं सकता है! ज़ाहिर है मुझे यह कहने की ज़रूरत नहीं कि किसी भी संस्था का अच्छा हैड कहलाने के लायक वो होता है जो संस्था से जुड़े लोगों से मशवरा करने के बाद ही कोई फैसला करता है!
हैड होने का मतलब यह भी नहीं कि पति पत्नी दोस्त नहीं बन सकते, दोस्त तो बाप बेटा भी बन सकते हैं और बहुत से घरों में वह दोस्तों की तरह होते भी हैं लेकिन दोस्ती के बाद भी बाप को वो हक रहते हैं जो एक बाप होने के नाते उसको कुदरत ने दिए हैं! इसी तरह पति पत्नी भी आपस में अच्छे दोस्त ज़रूर होने चाहियें लेकिन पति के प्रमुख होने को चैलेंज किये बिना! 
पति के प्रमुख होने की वजह से ही शायद हमारे यहाँ यानि हिन्दुस्तान में पति को परमेश्वर और स्वामी कहा जाता था और पत्नी पति के पैर छूती है और उसके नाम का सिन्दूर और मंगल सूत्र बांधती है! और शायद यही वजह है कि रिश्ता करते वक़्त भी लड़की की उम्र लड़के से कुछ कम देखी जाती है! बहर हाल इस्लाम में इन सब को तो अहमयत नहीं दी जाती लेकिन पति पत्नी के रिश्ते में पति को ज़रूर एक दर्जा बड़ा माना जाता है!
किसी को अपने ऊपर प्रमुख बनाने का मतलब यह हरगिज़ नहीं होता कि अब हम उसके रोबोट बन गए हैं और वो जैसे चाहे हमें इस्तिमाल करे! हर प्रमुख की भी अपनी हदें होती हैं! जैसे ट्रेफिक हवालदार चोराहे का प्रमुख है उसके एक इशारे पर हमें रुकना होगा और बिना उसकी मर्ज़ी के हम आगे नहीं बढ़ सकते इसी तरह शोहर सिर्फ अपने परिवार के मामलों में ही पत्नी पर प्रमुख बना है! इसका मतलब है कि अगर घर के किसी मामले में पति पत्नी एक मत नहीं हो पा रहे तो वहां आखरी फेसला करने का हक़ पति को है! मिसाल के तौर पर बच्चे का एडमिशन किस स्कूल में होना चाहिए इस पर पति और पत्नी एक मत नहीं हैं तो आखरी फैसला कौन करेगा वो पति का हक है! पत्नी की किसी आदत से घर या उनके रिश्ते को कोई खतरा महसूस हो तो पति पत्नी को उस में हुक्म देने का हक रखता है! मसलन बीवी सिग्रेट पीती है जिससे बच्चे को खतरा है तो पति पत्नी को सिग्रेट छोड़ने का हुक्म दे सकता है! घर में किसी का आना अगर पति को पसंद नहीं तो वो उस पर रोक लगाने का हक रखता है! 
 शोहर बीवी पर अपने घर के ऐसे ही मामले में हक रखता है इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि वो उसके ज़ाति मामलों में भी उस पर हुक्म चला सकता है!
जैसे बीवी का खुद का जो पैसा वगैरह हो उस पर शोहर को कोई हक नहीं बीवी चाहे जहाँ खर्च करे! बीवी क्या पहने गी, क्या खाएगी, अपने मइके वालों में से किस से मिलेगी और किस से नहीं मिलेगी वगैरह यह बीवी के अपने ज़ाति मामले हैं जिनमें शोहर को फैसले करने का कोई हक नहीं! आप को शायद इस बात पर एतराज़ हो लेकिन सच यही है कि इस्लाम में पति अपने माँ बाप की सेवा करने के लिए पत्नी को मजबूर नहीं कर सकता और ना ही वो उसे मस्ज़िद में नमाज़ पढने से रोक सकता है यह उसके हक से बाहर के मामले हैं! यह बात अलग है कि ज़्यादातर बीवी खुद ही अपने शोहर की इन मामलों में भी पसंद और ना पसंद का ख्याल रखती लेकिन यह उसकी जुम्मेदारी नहीं बल्कि मुहब्बत और उसका अहसान है.
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ऐसे ही घर का प्रमुख होने के नाते पति को तलाक देने का हक़ है, पत्नी को तलाक देने का नहीं बल्कि लेने का हक है! यह ऐसे ही है जैसे आप के बॉस को आप को नौकरी से निकालने का हक है और आप को इस्तिफा देने का हक है! तलाक देने का सही इस्लामी तरीका जानने के लिए पहले यह पोस्ट पढ़ें -
https://www.facebook.com/musarraf.ahmad/posts/641575535957414
इस पर एक आम सवाल किया जाता है कि बीवी को भी तलाक देने का हक क्यों नहीं है ?
तो इसकी एक वजह मैं ऊपर लिख चुका हूँ यानि शोहर घर का प्रमुख है इसलिए घर के बड़े फैसले लेने का हक उसे ही पहुँचता है! दूसरी वजह यह है कि शोहर तलाक देता है तो वो पहले ही कानून बच्चों की परवरिश का और इद्दत तक बीवी के खर्च का जुम्मेदार होता है यही नहीं बल्कि उसने जो कुछ ज़ेवर, रुपया, जायदाद, कीमती तोहफे वगैरह बीवी को पहले दिया होता है कानूनन उसे वापस लेने का हक दार नहीं होता (सूरेह बक्राह आयत 229 और सूरेह निसा आयत 20)!
लेकिन जब बीवी तलाक लेती है तो क्यों कि आम तौर पर उसके पास शोहर का दिया हुआ महर और दूसरे माल होते हैं इसलिए तलाक से पहले उन में कुछ फैसला करना ज़रूरी है ताकि अगर बीवी के पास शोहर का दिया हुआ कुछ माल है या महर की रकम बहुत ज़्यादा थी तो उसमें अदालत के सामने कुछ फैसला कर के बीवी को तलाक दे सके इसलिए बीवी को तलाक देने का हक नहीं है! अगर ऐसा होता तो बहुत सी बार बीवी शोहर से महर और दूसरे कीमती गहने वगैरह ले कर उसे तलाक देकर उसे छोड़ देती जिससे मर्दों के लिए कई मसले खड़े हो जाते!
इस में यह भी गलत फहमी हमारे यहाँ आम पाई जाती कि अगर बीवी तलाक खुद मांगे तो उसको पूरा महर वापस करना होगा! जबकि असल बात यह है कि महर कितना वापस होगा और कितना नहीं यह काज़ी (जज) फैसला इस बुन्याद पर करेगा कि तलाक लेने के पीछे क्या क्या वजह हैं! पति के रवैये और हालात के हिसाब से इसमें अलग अलग फैसले हो सकते हैं!
एक आम गलत फहमी यह भी हमारे यहाँ मौजूद है कि अगर बीवी तलाक मांगे तो उसे कोई बड़ी वजह साबित करनी होगी, जबकि हकीक़त यह है कि यह बिलकुल ज़रूरी नहीं कि शोहर ज़ालिम या बुरा आदमी हो तो ही बीवी तलाक मांग सकती हैं नहीं बल्कि अगर सिर्फ इतनी भी वजह है कि बीवी को शोहर पसंद नहीं तो भी वो तलाक लेने का हक रखती है!
एक ऐसे ही मामले में अल्लाह के रसूल (स) के पास एक औरत आईं जिनका नाम जमीला था अर्ज़ किया कि मुझे शोहर से तलाक दिला दीजये, मुझे उनसे वैसे तो कोई शिकायत नहीं लेकिन बस वो मुझे पसंद नहीं हैं! और मैं नहीं चाहती कि मैं उनकी नाशुक्र बन कर रहूँ! (यानि वो मुझे पसंद नहीं तो मैं उनको दिल से वो इज्ज़त नहीं दे पाउंगी जिसके वो हक दार हैं)
अल्लाक के रसूल (स) ने फ़रमाया कि तुम्हारे शोहर ने तुम्हे अपना बाग़ दिया हुआ है क्या तुम उसे वापस कर सकती हो ? उन्होंने कहा कि हाँ कर दूँगी! फिर उनसे आगे कोई सवाल नहीं किया गया और उन्हें तलाक दिलवा दी गई! (सही बुखारी 5273)

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