औरत और इस्लाम 4

{{ औरत और इस्लाम }}}
भाग - 4
(औरतों की मौजूदा समस्याएँ और उनका हल.)
यह हकीक़त है कि हमारे समाज में ससुराल में औरतें काफी असुरक्षा (Insecurity) के अहसास के साथ ज़िन्दगी गुज़ारती हैं और यह बात मैं सिर्फ मुस्लिम समाज के बारे में ही नहीं कर रहा हूँ बल्कि गैर मुस्लिम समाज भी अगर ईमानदारी से अपने गिरेबान देखें तो हालात वहां भी अच्छे नहीं हैं.
जो लड़कियां पढ़ लिख कर कुछ काबिल हो जाती हैं वो तो शादी के बाद बुरे हालात का मुकाबला किसी तरह कर लेती हैं लेकिन बाकि कम पढ़ी लिखी लड़कियों के पास भी शादी के बाद अगर कुछ बुरे हालात पेश आएं तो उनसे निपटने के लिए उनके पास कुछ नहीं होता. लेकिन मेरी पोस्ट क्यों कि इस्लाम के हवाले से है इस लिए मैं यहाँ सिर्फ मुस्लिम और इस्लाम ही की बात करूँगा. 
:- हमारे समाज में शोहर-बीवी के रिश्तों में कई परेशानियाँ और मुश्किलें मौजूद हैं हमारा सामाजिक ढांचा जॉइंट फैमिली सिस्टम पर चलता है जिसकी वजह से कई परेशानियों ने जन्म लिया है, जॉइंट फैमिली सिस्टम इस्लाम में नहीं है इस्लाम में बीवी के लिए अलग घर का होना बीवी का हक माना गया है. लेकिन हमारे समाज में एक बीवी बीवी से ज़्यादा एक भरे पूरे घर की बहु बन कर आती है जहाँ उसे सिर्फ एक बीवी की जुम्मेदारी से कहीं बढ़ कर एक बहू की जुम्मेदारी भी निभानी होती हैं, आम तौर पर लड़के अपनी नई दुल्हन से यही उम्मीद करते हैं कि वो उस से ज़्यादा उसके माँ, बाप और अगर हैं तो छोटे भाई बहनों का ख्याल रखेगी, जिससे दुल्हन पर मानसिक और शारीरिक भार ज़्यादा पड़ता है और अगर वो एक बहू का किरदार सही से ना निभा सके तो उसकी शादी शुदा ज़िन्दगी भी खराब होने लगती है. 
:- इसके साथ महर की रकम कम होना. 
:- बाप की जायदाद में हिस्सा ना मिलना. 
:- और जहेज़ जैसी ज़ालिमाना रसम (खास कर ऐशिया में) मुस्लिम समाज में भी खतरनाक हद तक अपनी जड़ें मज़बूत कर चुकी है जिस से एक दम निपटना फिलहाल मुमकिन नहीं लगता.
:- कुछ लोग तलाक के अपने हक को भी बीवी के खिलाफ हत्यार की तरह इस्तिमाल करते हैं वो बीवी पर दबाव बनाने के लिए बात बात पर उसे तलाक देने की धमकी देते रहते हैं.
:- कुछ लोग गुस्से में बीवी को तीन तलाक एक साथ दे देते हैं, यह अपने आप में एक ज़ुल्म है लेकिन इससे बड़ा ज़ुल्म इसके बाद तब होता है जब तलाक शुदा औरत अगर वापस आना चाहे तो उसे नाजायज़ हलाला यानि किसी दूसरे मर्द के साथ एक रात गुज़ारनी पड़ती है जिससे औरत के आत्म सम्मान को गहरी ठेस पहुँचती है. हालाँकि यह बुरी रसम शर्यत के नाम पर अदा की जाती है लेकिन असल में शर्यत का इससे कोई नाता नहीं है इसकी कुछ तफसील मैं पहले लिख आया हूँ.
:- कई मर्द ऐसा भी करते हैं कि बिना किसी ठोस सामाजिक वजह के सिर्फ अपनी मोज मस्ती के लिए चोरी से दूसरी शादी कर लेते हैं और फिर दूसरी बीवी की तरफ पूरे झुक जाते हैं और पहली बीवी के हक अदा नहीं करते.
यह मुख्य समस्याएँ हैं जो आज कल हमारे यहाँ औरतों के सामने मौजूद हैं.
इन सब समस्याओं के हल के लिए लड़कियों को खुद कुछ कदम उठाने होंगे और अपने वो हक मांगने होंगे जो अल्लाह के दीन ने उन्हें दिए हैं. उनको यह बात समझनी होगी कि आम तौर पर मर्द खुद आगे बढ़ कर उन्हें उनका हक नहीं देंगे यह वही लोग दे सकते हैं जिनके अन्दर अल्लाह के सामने जवाब देहि का एहसास पूरी तरह जिंदा हो और ऐसे लोग हमेशा से बहुत कम होते हैं.
*सबसे पहला हक है विरासत में हिस्सा.... औरतों को खुद आगे आकर भाइयों से अपना हिस्सा लेना चाहिए, अगर कोई बहन यह समझती है कि उसके हिस्सा लेने से उसके भाई का घर तबाह हो सकता है तब भी वो अपना हिस्सा ले और फिर अगर ज़रूरी समझे तो भाई को उधार के तौर पर या अहसान के तौर पर देदे ताकि भाई और उसके परिवार को आप के उस अहसान का अहसास रहे जो आप ने उसे अपना हिस्सा उधार दे कर उस पर किया है. इससे समाज में बहनों को हिस्सा मिलने का रिवाज पड़ेगा जो औरतों के लिए बहुत फायदे मंद होगा.
*जहेज़ की रस्म एक दिन में अगर कोई ख़त्म कर सकता है तो वो भी औरत ही है. लड़कियों को चाहिये कि बिना जहेज़ के शादी करें. जहेज़ की वजह से ससुराल में बहुत सी लड़कियों को जो कुछ सहना पड़ता है उसे बयान करने की ज़रूरत नहीं वो हर कोई जानता है. आम तौर पर लड़कियां यह समझती हैं कि जहेज़ की वजह से ससुराल में उनकी इज्ज़त होगी, यह गलत ख्याल है और अपने ही पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारने जैसा है. इस्लाम ने जब घर की हर चीज़ खरीदने का जुम्मेदार शोहर को किया है तो बीवी क्यों यह जुम्मेदारी खुद उठाए ?
*शादी के बाद की कई समस्याओं का हल इस्लाम ने निकाह के वक़्त में रखा है. वो यह है कि हर लड़की-लड़का या समाज अपने हालात के हिसाब से निकाह के फॉर्म में जो और जितनी चाहे वो जायज़ शर्तें लिख सकता है. हमारे निकाह के फॉर्म को अपग्रेड किया जाना चाहिए आज कल के हालात में यह बहुत ज़रूरी हो गया कि उस में ऐसे कॉलम शामिल किये जाएँ जिनसे लड़कियों को शादी के बाद आने वाली ज़िन्दगी में क़ानूनी तौर पर सुरक्षा मिलती हो.
जैसे - अगर लड़की शादी के बाद भी पढ़ना या नौकरी करना चाहती है तो इस शर्त को निकाह के फॉर्म में शामिल किया जाए कि लड़की अगर आगे पढ़ना या नौकरी करना चाहेगी तो उसे उसके पति और पति के परिवार वालों की तरफ से कोई रोकने की कोशिश नहीं की जाएगी..
- लड़का इतनी रकम हर महीने लड़की को ज़ाति खर्च के लिए देगा.
- अगर भविष्य में कभी लड़की चाहेगी तो उसे पति अपने घर वालों से अलग रखेगा.
- अगर लड़की की मर्ज़ी के बिना पति ने तलाक दिया तो उसे इतनी रकम महर के अलावा देनी होगी.
इस तरह की और शर्तें भी निकाह में शामिल की जा सकती हैं जो हर जोड़े की अपनी हेस्यत और ज़रूरत के मुताबिक हों, लड़के की भी अगर कोई शर्त हो मसलन अगर वो चाहे कि उसकी बीवी अलग रहने का अपना हक छोड़ दे तो यह भी उसमे शामिल किया जा सकता है. ज़ाहिर है इन शर्तों के कॉलम बहुत सोच समझ कर बनाए जाने चाहिए और लड़का और लड़की दोनों में से किसी एक पर ऐसा दबाव भी नहीं डाला जाना चाहिए जिससे लड़का या लड़की के लिए शादी या तलाक मुश्किल हो जाए, इस्लाम शादी और तलाक को सोच समझ कर लेकिन आसान तरीके से कराना चाहता है यह बहुत ज़रूरी चीज़ है इसलिए निकाह के फॉर्म में नए कॉलम शामिल करते वक़्त इसका खास ख्याल रखा जाना चाहिए. मेरा मकसद यहाँ शादी के फॉर्म को पूरी तरह बना कर दिखाना नहीं बल्कि सिर्फ यह दिखाना था कि निकाह का फॉर्म एक बहतरीन विकल्प है जिससे बहुत कुछ सुधार किया जा सकता है.
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*(एक साथ तीन तलाक और हलाले का मसला)
यह तो मैं पहले ही बता चुक हूँ कि प्लान बना कर किया गया हलाला किसी भी तरह जायज़ नहीं यह इस्लाम के मिजाज़ से किसी भी तरह मेल नहीं खाता. कुरआन ने तीन तलाक के बाद मौजूदा हलाले की नहीं बल्कि निकाह की शर्त लगाई है और निकाह किसी वक्ती जिस्मानी कॉन्ट्रैक्ट को नहीं कहते.
तलाक का सही इस्लामी तरीका भी मैं लिख चुका हूँ लेकिन एक पेचीदा सवाल अभी भी बाकि रहता है कि अगर कोई गुस्से में इस्लाम के तरीके के खिलाफ जा कर अपनी बीवी को एक साथ 3 तलाकें देदे और बाद में पछतावे और फिर से उसी से निकाह करना चाहे तो क्या करना होगा ? और यही वह सवाल है जो आज कल सबसे ज़्यादा पूछा जा रहा है. कि क्या यह तीन तलाकें तीन ही मानी जाएंगी या इसे एक तलाक माना जाए ?
अब यह मसला शर्यत से निकल कर फिकह का हो गया है इसलिए इस मसले में उलेमा में इख्तिलाफ है कुछ इसे तीन तलाक ही मानते हैं और कुछ इसे एक तलाक मानने का फतवा देते हैं.
कुछ हदीसों से भी मालूम होता है कि हज़रत उमर (र) के दौर से पहले इसे एक ही तलाक माना जाता था. जैसे सही मुस्लिम 1180 या 1472 - हज़रत इब्ने अब्बास (र) से रिवायत है कि रसूल अल्लाह (स) और अबू बकर (र) और हज़रत उमर (र) की खिलाफ़त के शुरू के दो साल तक एक साथ 3 तलाकों को एक ही माना जाता था सो उमर (र) ने अपनी खिलाफत के दौर में कहा कि इस हुक्म में जो लोगों को मोहलत दी गई थी उस में लोगों ने जल्दी शुरू कर दी है बस अगर हम तीन ही नाफ़िज़ कर दें तो मुनासिब होगा, लिहाज़ा उन्होंने तीन तलाक ही नाफ़िज़ करने का हुकुम दे दिया.
दूसरी रिवायतों से पता चलता है कि हज़रत उमर (र) ने ऐसे लोगों को सज़ा देने का कानून भी बनाया था जो 3 तलाक एक साथ देते थे. 
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जो मसलक इस तरह की तीन तलाक को तीन ही मानते हैं उनके यहाँ कुछ उलेमा में इसकी भी गुंजाइश है कि शोहर से पूछा जाए कि ''क्या तुमने तीन बार तलाक यह जान कर दी है कि शर्यत ने तुम्हे ज़िन्दगी में तीन बार तलाक का हक दिया है या तुमने शब्द ''तलाक'' तीन बार इस लिए बोला है क्यों कि तुम अनजाने में यह समझते थे कि तलाक तो बिना तीन बार कहे होती ही नहीं है ?'' 
अगर इस सवाल के जवाब में उसने कहा कि मैं समझता था कि तलाक के लिए शर्यत में 3 बार कहना ही ज़रूरी है. तो ऐसे केस में इस को 3 नहीं बल्कि एक तलाक माना जाएगा.
किसी केस में ऐसा भी हो सकता है कि तलाक देने वाले ने ताकीद के लिए तीन बार कहा हो ना कि अपने तीनों हक एक साथ इस्तिमाल करने के लिए.
हमारे यहाँ यह तरीका आम है कि किसी बात को अच्छी तरह वाज़ह (स्पष्ट) करने के लिए एक ही शब्द को तीन बार भी बोल दिया जाता है लिहाज़ा अगर शोहर ने भी ताकीद की नियत से तलाक शब्द पर जोर देने के लिए उसे तीन बार कहा है तो उसे एक ही माना जाएगा.
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* अवाम में से जो लोग अपनी जिहालत की वजह से फ़िलहाल तीन तलाक के शिकार हैं और वापस निकाह करना चाहते हैं, उनके लिय इसके अलावा कोई हल नहीं है कि उन को चाहिये कि उन उलेमा की दलीलों पर गौर करें जो एक साथ तीन तलाक दिए जाने को एक तलाक मानते हैं, फिर अगर उनकी दलीलों पर उनका दिल मुत्मइन हो जाए तो बिना हलाले के वापस निकाह कर लें.
और अगर उन दलीलों पर दिल मुत्मइन नहीं है तो वापस निकाह का ख्याल छोड़ दें क्यों कि इस हलाले से तो उनका निकाह जायज़ होने वाला नहीं बल्कि और उल्टा ज़िना का भी गुनाह उनके सर होगा.
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* हमें ऐसा कानून भी पास कराना चाहिए जिस से तीन तलाक एक साथ देने वाले या तलाक देते वक़्त इस्लाम के किसी भी नियम की अनदेखी करने वाले शोहर पर कोई वाजिब जुरमाना और सज़ा हो सके.
* हलाले को गैर क़ानूनी घोषित किया जाना चाहिए.
* मैं पहले लिख आया हूँ कि एक बीवी के रहते दूसरी शादी की इजाज़त इस्लाम ने सिर्फ समाजी ज़रूरत के लिए दी है ना कि मोज मस्ती के लिए. इसलिए ऐसा कानून बनाया जाए जिसके तहत अगर कोई दूसरी शादी करना चाहता है तो उसे पहले अदालत में उसकी ज़रूरत साबित कर के अदालत से इसकी इजाज़त लेनी होगी. साथ ही अदालत ऐसे मोके पर यह भी देखे कि शोहर दोनों बीवियों के बीच इन्साफ करेगा.
*एक आम सवाल यह भी किया जाता है कि क्या जिस शोहर ने तलाक दिया है उस पर महर के अलावा भी कुछ जुरमाना हो सकता है जिससे औरत आगे की ज़िन्दगी गुज़ार सके ?
तो इसका जवाब है कि किसी केस में ऐसा जुरमाना भी दिया जा सकता है, बल्कि कुरआन ने तो बाकाएदा हुकुम दिया है कि जिस औरत को तलाक दिया गया है उसे इद्दत के बाद कुछ ज़िन्दगी गुज़ारने का सामान दिया जाए. इस का ज़िक्र कुरआन की सूरेह बक्राह 241 में कुछ इस तरह है कि - जिस औरत को तलाक दिया है उसे हर हाल में दस्तूर के मुताबिक ज़िन्दगी गुज़ारने का सामान दे कर रुखसत करना चाहिये जो लोग खुदा से डरने वाले हैं उन पर यह देना ज़रूरी है.
कुरआन ने यहाँ कुछ तय नहीं किया कि ज़िन्दगी गुज़ारने का कितना सामान देना है बल्कि इसे भी समाज के दस्तूर पर छोड़ दिया है, इसमें अदालत महर की रकम देख कर कुछ रकम और जो शोहर की हेस्यत के मुताबिक हो देने का हुक्म कर सकती है. शर्यत में इसकी पूरी गुंजाइश है कि अदालत पूरे हालात देख कर इस तरह की कोई कारवाही मर्द पर करे. इस्लाम का पहला हुक्म इन्साफ को कायम करना है लिहाज़ा जिस केस में इन्साफ का जो भी तकाज़ा हो कानून को वही फैसला करना चाहिए. 
* हमारे समाज को और खास कर औरतों के हक के लिए काम करने वाली संस्थाओं को विधवा की दूसरी शादी को भी बढ़ावा देना चाहिए, कम से कम मुस्लिम देशों की हुकुमत को इसे बढ़ावा देने के लिए विधवा की दूसरी शादी पर कुछ माली मदद भी ज़रूर देनी चाहिए.
यह वह चन्द तरीके हैं जो मौजूदा हालात में औरतों की कई मुश्लिकों को दूर कर सकते हैं. 
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मैंने अपनी पूरी पोस्ट में पति पत्नी के रिश्ते के सिर्फ क़ानूनी हक लिखे हैं तो शायद किसी को यह गलत फहमी हो जाए कि इस्लाम में पति पत्नी का रिश्ता तो बस कानून की जंजीरों से बंधा हुआ एक अनुबंध है और इसमें प्यार और क़ुरबानी जैसे जज़्बात नहीं हैं!
अगर किसी को यह गलत फहमी हुई है तो यह सिर्फ मेरे लिखने का कुसूर है, हकीकत यह है कि यह रिश्ता कानून से कही ज़्यादा जज़्बात पर टिका होता है, कुरआन कहता है - 
......अल्लाह ने तुम्हारी ही नस्ल से तुम्हारे जोड़े बनाए ताकि तुम उनके पास सुकून-इत्मीनान हासिल करो, इस के लिए उसने तुम्हारे अन्दर एक दूसरे के लिए मुहब्बत और हमदर्दी के जज़्बात डाल दिए....(सूरेह रूम 21)
पति पत्नी का रिश्ता ऐसा होना चाहिए कि वह एक दूसरे से मुहब्बत करें एक दूसरे को तकलीफ से बचाएं और एक दूसरे के ऐबों को छुपाएँ, उन्हें शर्मिंदा होने से बचाएं, शौहर बीवी के रिश्ते को कुरआन ने एक बहतरीन मिसाल से बयान किया है कि - वो यानि बीवी तुम्हारा लिबास हैं और तुम उनका लिबास हो (सूरेह बक्राह 187)
शोहर को नसीहत करते हुए एक आयत का एक हिस्सा ऐसे है कि - .....बीवी के साथ अच्छे तरीके से ज़िन्दगी बसर करो अगर वो तुम्हे पसंद ना भी हो तो सोचो कि हो सकता है उनकी एक चीज़ तुम्हे पसंद ना हो लेकिन अल्लाह ने उसी में तुम्हारे लिए बहुत कुछ भलाई रख दी हो (सूरेह निसा 19) 
अल्लाह के आखरी रसूल (स) ने तो इंसान के अच्छा और बुरा होने का पैमाना ही बीवी को करार देते हुए फरमाया कि- "ईमान में सबसे ज्यादा मुकम्मल वह आदमी है जिसकी आदत और अख्लाक सबसे अच्छें हों और तुम मे सबसे बेहतर वो इंसान है, जो अपनी बीबी के साथ सबसे अच्छा बर्ताव करता हो।" (अल-तिरमिज़ी 628)
अपना कीमती वक़्त मेरी पोस्ट को देने के लिए आप का बहुत बहुत शुक्रिया. वस्सलाम.

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