मुसलमानों में इत्तिहाद का ख्वाब

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आज के ज़माने में मुसलमानों में जो नारा सबसे ज़्यादा पसंद किया जाता है वो मुसलमानों के इत्तिहाद (एकता) का नारा है. आम मुसलमान से लेकर खास मुसलमान तक, अमीर से लेकर गरीब तक, देहाती से लेकर शहरी तक, नए ख्यालात वाले मुसलमान से लेकर पुराने ख्यालात वाले मुसलमान तक और जाहिल से लेकर आलिम तक हर मुसलमान का यह ख्वाब है कि पूरी दुनियां के मुसलमान एक हो जाएं और दुनियां में अपना खोया हुआ मुकाम वापस हासिल करें.
यह चाहत या ख्याब अपने आप में एक अच्छी चीज़ है इससे इंकार करना किसी मुसलमान के लिए शायद मुमकिन नहीं. लेकिन उन्नीसवी सदी से यह ख्वाहिश एक ख्वाब ही बनी रही है, जिसके पूरा होने के आसार अभी नज़र नहीं आते.
आज की हकीकत यह है कि इस ज़मीन पर हम मुस्लिम दुनियां को देखें तो पाते हैं कि मुसलमान दर्जनों रियासतों में अपने अपने सियासी, तहज़ीबी (Cultural) समाजी और मस्लकी इख्तिलाफों के साथ बिखरे हुए हैं. और मुसलमानों का यह अलग अलग गिरोह में बटना उनकी दीन और दुनियां दोनों को तबाह कर रहा है.
इस से उलट गैर मुस्लिम दुनियां में आज के ज़माने ही ने अपनी आखों से यह भी देखा है कि हजारों साल से बेशुमार रियासतों में बटा हुआ और बेरहम आपसी जंगों का शिकार यूरोप, यूरोपियन यूनियन के रूप में एक इकाई बनने की तरफ कामयाबी के साथ एक अरसे से बढ़ रहा है. उनकी इस एकता ने वहां लोगों की ज़िन्दगी को बहुत बहतर बनाया है, उनकी तरक्की के लिए कई नई राहें खोली हैं और कई मुश्किलों के हल उन्हें मिले हैं. यह एक मिसाल है और मुसलमानों को इससे सीखने की ज़रुरत है. ख़ैर....
ऐसा नहीं है कि मुसलमानों में इत्तिहाद (एकता) की कोशिश करने वालों से यह ज़मीन कभी खाली रही है बड़े बड़े उलेमा की बे शुमार कोशिशों, अरबों की बे पनाह दौलत और सब मुसलमानों के दिलों में पलने वाली इत्तिहाद (एकता) की ख्वाहिश के बावजूद यह ख्वाब अभी तक बस एक ख्वाब ही है तो इसकी कोई ना कोई वजह ज़रूर होगी.
हमारे नज़दीक (अनुसार) इसकी वजह हमारी वो उलटी तरबियत (सीख, शिक्षा) है जो हमें एक तो क्या करेगी बल्कि जो थोड़ा बहुत फितरी इत्तिहाद मुसलमानों में बाकि है उसे भी वह धीरे धीरे ख़त्म कर रही है.
यह उलटी तरबियत अपने तआस्सुबात (पूर्वाग्रहों,पक्षपात) से जकड़े रहने और इख्तिलाफे राय (मत के भेद) को बर्दाश्त ना करने की तरबियत है. पूरी मुस्लिम उम्मत के मज़हबी या गैर मज़हबी इल्मी इदारों (शिक्षण संस्थानों) को देख लीजये कहीं भी हमारी यह तरबियत नहीं की जाती कि हमें इख्तिलाफ़ को गवारा करना है. हमें कहीं यह नहीं सिखाया जाता कि जितना मुझे एक राय रखने का हक है उतना ही हक दूसरे को कोई दूसरी राय अपनाने का है.
आज मुसलमानों के अकसर गिरोह को देख लीजये वो अपना इल्म, अपना अमल, अपनी दीन दारी, अपनी हक परस्ती और अपने बुजुर्गों की बड़ाई में मगन है. बात इतनी भी होती तो ख़ैर थी लेकिन वो हर दूसरी राय रखने वाले को काफ़िर, मुशरिक, गुस्ताख़, बिदअति, गुमराह, अमेरिका का एजेंट वगैरह करार देते हैं, वो बद गुमानी करते हैं, नीयतों पर हमले करते हैं, बोहतान लगाते हैं, गीबत करते हैं, खिल्ली उड़ाते हैं, गालियाँ देते हैं यानि इख्तिलाफ होते ही वो सब अख्लाकी कायदों (नैतिक मूल्यों) को अपने पैरों से रोंग डालते हैं और इसपर कमाल ये है कि इन सब अख्लाकी बुराइयों के साथ साथ उनका दावा यह होता कि वो इस्लाम की ख़िदमत और उसकी हिफाज़त कर रहे हैं.
जब तक हमारा रवैया यही रहेगा तब तक मुसलमानों में इत्तिहाद नहीं हो सकता बल्कि हर आने वाले दिन के साथ हम और ज़्यादा बटेंगे.
इस मसले का हल यही है कि हमें इख्तिलाफे राय को गवारा करना सीखना होगा.
हमें यह बात समझनी होगी कि सोचने समझने वाले लोग इख्तिलाफ करते रहेंगे, इंसानों के पास जब तक दिमाग है तब तक उसे इख्तिलाफ से नहीं रोका जा सकता. बहसों के ज़रिये इख्तिलाफ को मिटाने की ज़्यादा कोशिश हकीकत में इख्तिलाफ को बढ़ा देती है जो बढ़ते बढ़ते नफरत में बदल जाती है, जबकि इख्तिलाफ़ को गवारा करने की कोशिश कुछ अरसे में इख्तिलाफ को मिटा देती है या अगर मिटा भी ना सके तो कम से उस इख्तिलाफ की वजह से दिलों में कोई खलिश नहीं हो सकती. 
 इख्तिलाफ को गवारा करने का मतलब यह हरगिज़ नहीं कि हम जिस बात को सही समझते हैं उसे बयान ही ना करें. सही बात कहना भी एक अख्लाकी जुम्मेदारी है और किसी का दिल ना दुखाना भी एक दीनी जुम्मेदारी है, इन दोनों जुम्मेदारियों के बीच हम अक्सर बैलेंस खो देते हैं, कुछ लोग सही बात कहने की फ़िक्र में दूसरे की इज्ज़त का ख्याल नहीं रखते तो कुछ लोग दूसरे की इज्ज़त रखने के लिए उनकी गलत बात में भी हाँ में हाँ मिला देते हैं. यह दोनों ही रवैये दीन के खिलाफ हैं.
सही रवैया यह है कि इख्तिलाफे राय होने पर अपनी राय अपनी दलीलें नरमी के साथ बयान करदी जाएं, अगर आप की दलीलों से कोई मुत्मइन नहीं हुआ तो उस पर ज़ाति हमले ना किये जाएं, और उसके इख्तिलाफ के हक को तस्लीम किया जाए, यह हक इंसानों को खुद उनके रब ने दिया है इस हक को छीनने की कोशिश सिवाए बर्बादी के और कुछ नहीं देती. 
किसी को गुमराह करार देने के बजाए अगर इज्ज़त के साथ बस इतना कह दिया जाए मैं इस मामले में उनकी इस राय को सही नहीं समझता और मेरी दलीलें यह हैं, तो फिर कोई वजह नहीं जो दो मुख्तलिफ राय रखने वालों के बीच किसी तरह का फिरका या नफरत पल सके, वे इख्तिलाफ रखने के साथ एक दूसरे को भरपूर इज्ज़त और अहतराम दे सकते हैं.
तआस्सुब (पूर्वाग्रह,पक्षपात) वो सबसे बड़ी वजह है जो हमें इख्तिलाफ को बर्दाश्त नहीं करने देती, इसके होते हुए किसी इख्तिलाफ को गवारा नहीं किया जा सकता. हमें इस हकीकत को मानना होगा कि यह एक ज़हर है जो सबसे पहले उस दिमाग हो खाता है जिसमे यह रहता है और अगर यह किसी कौम में आजाए तो उसे तबाह कर देता है.
इत्तिहाद करना है तो इख्तिलाफ को गवारा करना सीखना होगा, उम्मत को एक करना है तो तआस्सुब को जड़ से मिटाना होगा. इन के बगैर इत्तिहाद का नारा चाहे जितनी ज़ोर से लगाया जाए वो उम्मत पर कोई असर नहीं कर सकेगा. और इत्तिहाद का ख्वाब बस एक ख्वाब ही रह जाएगा.

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