तीन तलाक़ तीन या एक

तीन तलाक़ एक साथ या इंस्टेंट तलाक़ इस्लाम में हराम और अपराध  है इस पर सभी मुस्लिम विद्ववान एकमत हैं। लेकिन जिस चीज़ पर 1400 साल से इख़्तिलाफ़ यानि मतभेद है वो ये है कि अगर कोई मर्द कुरआन व सुन्नत के बताये हुए तलाक़ के सही तरीके को छोड़कर गलत तरीके से इंस्टेंट तलाक़ दे या एक साथ तीन तलाक़ दे तो क्या तलाक़ मानी जायेगी और मिया बीवी हमेशा के लिए अलग हो जायेंगे। जब ये मसला इस्लाम के दूसरे  खलीफा हज़रत उमर(रज़ि अल्लाहु अन्हु) के सामने पेश किया गया तो वो इस तरह एक साथ तीन तलाक़ देने वालों पर सख्त नाराज़ हुए और फ़रमाया तुमने उस मामले में जल्दबाजी क्यों कि जिस में अल्लाह ने वुसअत रखी थी। इसको इमाम मुस्लिम ने अपनी किताब में इस तरह बयान किया" रसूलुल्लाह सल्ललाहू अलैहि वसल्लम के ज़माने में और फिर हज़रत अबू बकर रज़ि के ज़माने में तीन तलाक़ एक ही मानी जाती थी और फिर हज़रत उमर का ज़माना आया तो हज़रत उमर ने तीन तलाक़ देने वालों को सजा  के तौर पर तीनो तलाक़ नाफ़िज़ करके उनकी बीवी को उनसे हमेशा के लिए अलग कर दिया और 100 कोड़े लगाने का हुक्म दिया। हज़रत उमर ने तीनों तलाक़ को तीन इसलिए नाफ़िज़ नहीं किया क्योंकि वो तीन ही होती है बल्कि सज़ा के तौर पर तीन नाफ़िज़ की रिवायत के अल्फ़ाज़ है "लौ अंज़ैनाहु" यानि इन्होंने अल्लाह की किताब से खेलकर तीनो दे डाली है तो हम भी इनपर तीनो ही नाफ़िज़ कर देंगे। ये नहीं फ़रमाया कि तीन देने से तीन ही होती है इसलिए तीन नाफ़िज़ करेंगे । अरब मुआशरे और इस्लाम में उस वक़्त भी और आज भी निकाह व मेहर से लेकर बीवी के खर्चो तक सारा खर्च मर्द के जिम्मे होता है इसलिए बीवी को तलाक़ से इतना नुक्सान नहीं होता जितना मर्द को होता है ।नया निकाह करने पर मर्द को दोबारा मैहर व निकाह में लाखों रूपये खर्च करने पड़ते हैं और औरत को कुछ खर्च करना नहीं पड़ता बल्कि मेहर व खर्च के तौर पर लाखों रूपये मिलते है या वो जितनी डिमांड करे। वहां आज भी मर्द तलाक़ देने से घबराते हैं।
हज़रत उमर का ये फैसला शरई नहीं बल्कि सज़ा के तौर पर एक सियासी फैसला था । जो हमेशा के लिए नहीं था। दारुल उलूम के बड़े आलिम मौलाना रशीद अहमद गंगोही ने भी अपने फतावा रशीदिया में भी यही लिखा है कि हज़रत उमर का फैसला वक़्ती और सियासी था।
आज हिंदुस्तानी समाज में जहाँ तलाक़ का सारा बोझ औरत पर पड़ता है और मर्द अनपढ़ होने की वजह से एक साथ तीन तलाक़ दे बैठते हैं यहाँ तीन तलाक़ को एक ही माना जाना चाहिए जैसा कि इस्लाम के शुरुआती दौर में माना जाता था और 1400 साल से बहुत से  सहाबा व उलेमा मानते आ रहे हैं । और अगर तीन ही मानने की जिद है तो फिर सज़ा के तौर पर मर्द की जायदाद का आधा हिस्सा उस तलाक़ शुदा औरत को मिलना चाहिए।

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